हमारे वेद पुराणों में कहा गया है कि सत्य और अहिंसा सबसे बड़ा  और पुनीत धर्म है। सभी धर्मों में सत्य और अहिंसा को  प्रधानता दी गई है।
सत्य बोलने वाले को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है किंतु सच की कभी हार नहीं होती है। एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ बोलना पड़ता है किंतु सत्य अपने स्थान पर अटल और अडिग रहता है। इसी तरह अहिंसा यानी किसी को दुख न देना शारिरिक या मानसिक यातना न देना अहिंसा कहलाता है। सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चल कर बड़े बड़े जंग भी जीते जा सकते हैं।
 किसी भी समस्या का समाधान हम आपस में बातचीत करके निपटा सकते हैं।अहिंसा द्वारा बुराई पर विजय पाया जा सकता है।
हिंसा , मारकाट, गोली बन्दूक चलाना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इससे मनुष्य के अंदर बदले की भावना जागृत होती है। महाभारत का युद्ध हिंसा के विनाशकारी परिणाम का एक ज्वलंत उदाहरण है। हिंसा का परिणाम बहुत भयंकर  होता है जिसके निशान सदियों तक अमिट रहते हैं। जिसकी वेदना ,पीड़ा और टीस हृदय के रंध्र- रंध्र को तार -तार कर देती है।
 अहिंसा - ---हिंसा का विपरीतार्थक शब्द है। अहिंसा का मतलब अपनी वाणी से अपने कर्म से अपने विचारों से किसी को आहत न करना। इसे अपनाकर हम समाज और  देश में सुख शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। दया, क्षमा प्रेम ,त्याग और सत्य अहिंसा के मुख्य स्रोत हैं। कहते हैं कि मीठी वाणी किसी क्रूर व्यक्ति के मन में भी शहद की तरह असर कर सकती है जैसे नारद जी ने रत्ना कर डाकू से कहा था और  वह बाद में महान कवि बन गए थे। 
यदि कोई हमारे साथ दुर्व्यवहार करता है और हम उसे क्षमा कर देते हैं तो वह निश्चय ही सोचने पर मजबूर हो जायेगा। हमारे देश और विश्व के कई नेता महान पुरुषों ने सत्य और अहिंसा को अपनाया और उसका प्रचार प्रसार भी किया।
अंग्रेजों ने भारत में वर्षों तक राज किया ,हम भारतीयों पर  कितने अत्याचार किये, कितनी प्रताड़नाएं दीं किन्तु राष्ट्रपिता माहत्मा गांधी जी ने सत्य और अहिंसा का  मार्ग अपना कर अंततः उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर कर ही दिया।
यदि बापू हिंसा का मार्ग अपनाते तो जितना नुकसान हुआ उससे बहुत ज्यादा नुकसान हो सकता था तथा ये युद्ध ज्यादा समय तक खिंच सकता था किन्तु उन्होंने सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाया। 
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि सत्य और अहिँसा द्वारा समाज में शांति की स्थापना की जा सकती है देश कर गौरव को अक्षुण्ण रखा जा सकता है। सत्यवादी पुरुष सदियों तक लोगों के  मानसपटल पर अंकित रहते हैं जैसे हमारे बापू।
सत्य और अहिंसा मनुष्य का सबसे बड़ा युद्ध का शस्त्र भी है जो कभी नष्ट नहीं हो सकता या बेकार नहीं जा सकता।

   अहिंसा सत्य, अचूक शस्त्र, जो जन यह  अपनाय।
    बड़ी लड़ाई को लड़े,  अरि पीछे हट जाय।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
नई दिल्ली