दुल्हन
नव परिधान धर
चली ससुराल
सौंदर्य से लजाती
रति और काम को
प्रेम रख मन में
हाथों पर मेंहदी
रच ली प्रियतम के नाम की
पुराना घर तज
अपनाने नव गृह
त्याग का रूप
समर्पण का सौंदर्य

दुल्हन
बावरी प्रेम में
भुला निज बजूद
चली होने फना
इश्क की राह में

दुल्हन
सिखाती दर्शन 
जीव पा लेता खुदा को 
इबादत, समर्पण से 
रच जाये मेंहदी 
रब के प्यार की 

दुल्हन 
राधा रानी श्याम की 
प्रेम की अवतार 
किशोरी मनभावनी 

दुल्हन 
मैं बनूं श्याम की 
अंत जीवन में 
रचा विवाह 
बस जाऊं गोलोक में 
दासी किशोरी स्वामिनी की
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'