!! आज फिर दूध उबल कर गैस से नीचे गिर गया!!
हे प्रभू अब फिर माँ डाँटेगी कि इस लड़की का ध्यान रहता किधर है,1 लीटर दूध आता है उसमें से तीन पाव ही बच पाता है गिरने के बाद।
क्या करूँ खो जाती हूं मैं भी अपने सुनहरे भविष्य की मीठी यादों में,सब इंस्पेक्टर के पद पर चयन हो गया था उसका रैंक भी बहुत अच्छी आयी थी,आखिर 2 साल की अथक मेहनत के बाबजूद उसे ये सफलता जो मिल रही थी, मन तो बस सरकारी नॉकरी की चाहत लिए बैठा था।इससे पहले भी कई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी और एग्जाम देती आयी है लेकिन... वही रिजर्वेशन नही होने के कारण रह जाती है हर बार अच्छे नंबर लाने के बाबजूद भी।
इस बार तो कोई भी नही रोक सकता मुझे ये नॉकरी पाने से।।हाहाहाहा।।।।
अरे बीनू!!!! ये अकेले में किससे बात कर के हंसे जा रही हो।।पागल वागल तो नही हो गयी हो न।।।ये स्वर उसकी माँ के थे( सौतेली) ।।
5 साल की थी बीनू जब उसकी माँ दूसरे बच्चे को जन्म देते समय ही परलोक सिधार गयी थी,बापू गज़ब का शराबी और ऐबी था,चार पैसा मज़दूरी कर के कमाता और उड़ा देता शराब में।
रिश्तेदारों ने एक गरीब घर की 15 साल की लड़की से बीनू के बाप की शादी करवा दी ये सोचकर कि घर बस जाएगा बच्चों को माँ भी मिल जाएगी।बीनू का बाप 15 साल बड़ा था नई माँ से।
लेकिन ईश्वर का लिखा कोंन जानता है,दूसरी माँ जिसको सब सोतैली माँ के नाम से पुकारते है वो शराबी - कवाबी पति को बिल्कुल भी पसंद नही करती थी।उसने शादी के 1 साल के अंदर ही बीनू के बाप को सुधार दिया था।
और काम के सिलसिले में शहर भेज दिया था ये बोलकर की 4 पैसा ज्यादा कमाना,पाई -2 का हिसाब रखना ।
घर और बच्चों की फिक्र मत करना मैं देख लूँगी सब।। आस पड़ोस
के लोग इंतज़ार में थे कि कब सौतेली माँ अपने रंग ढंग दिखाना शुरू करेगी।
बीनू का छोटा भाई मुन्नू जो जानता भी नही था कि उसकी माँ मर चुकी है वो तो नई माँ को ही अपनी मानता था ,नई माँ बहुत सझदार थी हाई स्कूल तक कि पढ़ाई की थी उसने ,आगे की पढ़ाई गरीबी के कारण माता पिता नही करा पाये थे लेकिन उसने सोच लिया था कि अब वो भी पढ़ेगी और अपने दोनों बच्चों को भी पढ़ाएगी।
बीनू का बाप सुधर चुका था हर महीने शहर से मिलने आता था और पूरा पैसा अपनी पत्नी को दे जाता था। बच्चों को पढ़ता देख उसे बहुत ख़ुशी मिलती थी, अब उसने ओवर टाइम करना शुरू कर दिया था ताकि उसके बीबी बच्चे अच्छे से जीवन यापन कर सकें।
दिन बहुत अच्छे से गुजर रहे थे,नई माँ ने बीनू को सिलाई,बुनाई,कढ़ाई, पढ़ाई सबमे पारंगत कर दिया था।।और उसे प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी करवाने लगी थी ।बीनू होशियार थी हर एग्जाम पास कर लेती थी।
दोनों बच्चों को अपने बच्चों से बढ़कर प्यार दिया था उसने ।।सब कुछ अच्छे से चल रहा था लेकिन.....
एकदिन शहर से ख़बर आयी की बीनू के बाप के मशीन में हाथ आ जाने से दोनो हाथ कट चुके थे।।अचानक से मुसीबतों का पहाड़ टूट चुका था ,कोई भी नही था जो उनकी कच्ची गृहस्थी को संभाल सके,बीनू का बाप घर आ चुका था ।
एक दिन नई माँ को एहसास हुआ कि वो माँ बनने वाली है।।।खुशी का कोई ठिकाना नही था उसकी।।।
लेकिन फिर अगले ही पल उसने सोचा कि इस तंगहाली में वो तीसरे बच्चे को कैसे पालेगी!!!
किसी को कुछ भी नही बताया उसने रातभर सोचती रही इस बच्चे के बारे में और अगले दिन.......
निकल पड़ी सरकारी अस्पताल दाई से मिली और कहा ये लो 2000 रुपये और चुपचाप गिरा दो मेरा ये बच्चा।
दायिओं का तो ये रोज़ का काम था पैसों की ख़ातिर राज़ी हो गयी।चुपचाप काम तमाम करवा के कुछ ही घंटों में वो बापिस अपने घर आकर सो गई।
बच्चे दोनो सो रहे थे,पति बेचारे दिव्यांग हो चुके थे अब पूरे घर की ज़िम्मेदारी उसी के कंधों पर आ चुकी थी,पहले तो उसने सभी से हेल्प मांगी लेकिन कोई मदद के लिए आगे नही आया ।
तो उसने सोच ही लिया कि अब वो ही कमाएगी,शुरू-2 में आस पड़ोस के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया,फिर धीरे-2 गाँव के एक स्कूल में पढ़ाने का काम भी मिल गया,उसका व्यवहार इतना अच्छा था कि अब तो सारे गॉव के बच्चे उसी से पढ़ने ट्यूशन आने लगे।।
कमाई का ज़रिया मिल चुका था।बीनू भी घर के कामो में मदद करवा दिया करती थी और बच्चों को भी साथ में पढ़ा दिया करती थी। साल दर साल बीत रहे थे नई माँ ने अपनी स्नातक पूरी करली थी और बीएड भी ,अब वो उसी स्कूल की पक्की टीचर बन चुकी थी।
इधर बीनू ने भी सब इंस्पेक्टर की परीक्षा पास करली थी।आज उसकी जॉइनिंग थी।नई माँ और पिता का आशीर्वाद लेकर निकल गयी वो अपनी मंज़िल को पाने।।।
अपने ख्वाब पूरे करने।।।
'एकता श्रीवास्तव' ✍️

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