तुमसे करूँ मुहब्बत मैं, तुमपे लुटाऊँ जान।
तेरे बिना न कोई वजूद है,तुम हो मेरी शान।।
तुझपे होता गर्व मुझे, तुझ पर है अभिमान।
तुमसे है जन्मों का नाता,तुमसे है मेरा मान।।
तुझपे मैं मरता हूँ हरदम,तुम्हीं हो मेरा प्रान।
तुझको आँख दिखाए तो,लेलूँ उसकी जान।।
तेरे अंदर इतनी खूबी है,तूतो है बड़ा महान।
तुझमें प्रेम भरा है इतना,जाने सकल जहान।।
तुम हो तो हम भी हैं,गायें सदा तुम्हारा गान।
तेरी गोदी में सर रखके,देखूँ नीला आसमान।।
तेरे लिए समर्पित मेरा,ये तन मन धन जान।
तेरे अश्मिता पे दाग लगे ना,प्रभु दो वरदान।।
हर रूप तुम्हारा मन मोहे, देखूँ सुबहो शाम।
आगे बढ़ते तुमको देखूँ, दिल मे रखूँ स्थान।।
जलें भुनें ये तुम्हें देखके,रोज पड़ोसी खान।
कैसे तुमको इतना चाहें, घर बाहर मेहमान।।
तू जिसका माँ-बाप है,जो तेरी ही है संतान।
उसे समझ नहीं आता,वह है कितना नादान।।
तुमको चोट कोई पहुँचाये,कर दूँ लहूलुहान।
तुम्हीं मेरे सपनों का भारत,तुम हो हिंदुस्तान।।
रचयिता :
*डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव*
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.

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