"भाईजान... भाईजान तुम्हें अम्मी बुला रही हैं "। मन्नत दौड़ते हुए अपने भाई अज़ान को बुलाने आई जो गांव किनारे लगे पीपल के पेड़ के नीचे गिल्ली डंडा खेल रहा था। 

"नहीं अभी मैं नहीं जाऊंगा, अभी मुझे दलजीत और आदर्श से अपना दांव लेना है । मेरी बारी है ।"

"नहीं भाईजान, आप घर चलो नहीं तो मैं घर जाकर अम्मी से बता दूंगी कि आप गिल्ली डंडा खेल रहे हो तब अम्मी  आपको ढूंढने के लिए निकल पड़ेंगी और फिर यही डंडा आपकी पीठ पर पड़ेगा। अम्मी के डंडे से बचना है तो सीधे घर चलो ।" मन्नत ने उसे अम्मी का डर दिखाया।

"अम्मी की चमची , रुक अभी तुझे बताता हूं"। अज़ान ने मन्नत की चोटी खींच ली।

"आ.... आदर्श भाई, दलजीत भाई मुझे बचाओ ।" मन्नत ने जबरदस्त तरीके से चिल्लाना शुरू कर दिया जिसमें 10 पर्सेंट सच्चाई और 90 पर्सेंट झूठ मूठ का ड्रामा था।

आदर्श और दलजीत ने अज़ान को पकड़ लिया और मन्नत मौका पाकर भाग गई।

"क्या यार ... तुम दोनों मुझी को रोकते हो। अपनी इस नकचढी बहन को कभी मना नहीं करते। इसे तो सर पर चढ़ा रखा है तुम लोगों ने "।अज़ान मुंह फुलाकर खड़ा हो गया।

"ओ यार तू ना नराज मत हुआ कर,हम तीनों दोस्तों के बीच एक तो बहन है वो भी कितनी मन्नतों के बाद रब ने हमें दी है । उसकी तो लाखों गलतियां माफ़ है"। दलजीत ने अज़ान के कंधे पर हाथ रखा।

"हां अज्जू, मन्नत तो हम सबको प्यारी है हम तीनों दोस्तों की लाडली बहन। अब तू गुब्बारे जैसा मुंह मत बना । घर जाकर  देख , अम्मी तुझे किसलिए बुला रही है। और हां ..  दांव की टेंशन मत ले, कल हम लोग अपना दांव दे देंगे। "आदर्श ने कहा।

अज़ान खुश हो गया और अपने दोस्तों से विदा लेकर घर पहुंचा । घर पर उसकी अम्मी उसका इंतजार कर रही थी 

"अज्जू ... तू आ गया । एक काम कर तैयार हो जा  , हाट चलना है । मन्नत को कल देखने वाले आ रहे हैं कुछ सामान लाना है । "

"ठीक है अम्मी, मैं दलजीत और आदर्श को बुलाकर लाता हूं। वो लोग घर का इंतजाम देख लेंगे।"

"कोई जरूरत नहीं बुलाने जाने की, हम लोगों को अम्मी ने पहले ही सारा काम समझा दिया था। तू अम्मी को लेकर बाजार जा और हम लोग  तब तक यहां सब कुछ संभाल लेंगे। "आदर्श और दलजीत ने अंदर आकर कहा।

ये सीन किसी फिल्म का सीन नहीं बल्कि एक  छोटे से गांव संग्रामपुर की कहानी है। जहां तीन परिवार तीन भाइयों की तरह रहते थे। मंजीत सिंह, अनुराग शर्मा,और अदीब आलम  की वेश भूषा भले ही अलग अलग हो लेकिन उनके दिल एक दूसरे के सीने में धड़कते थे। तीनों घर के बीच में एक ही आंगन था । चूल्हे भले ही अलग अलग थे लेकिन उन चूल्हों पर पकने वाली रोटी साझी होती थी। अगर किसी के चूल्हे पर रोटी बन रही है तो उस रोटी के कई टुकड़े होते थे और तीनों परिवारों में बंट जाते थे। मंजीत के घर में बना हुआ सरसों के साग की खुशबू पूरे घर में बाद में फैलती उसके पहले ही अदीब आलम और अनुराग के बच्चे कटोरी लेकर मंजीत की बीवी के पास पहुंच जाते थे। और अगर थोड़ा भी मक्खन किसी की कटोरी में ज्यादा पड़ गया तो समझो उन बच्चों में महाभारत शुरू हो जाती थी।

अदीब अपने बीवी बच्चों को मंजीत और अनुराग के भरोसे छोड़कर दुबई चला गया था। अब अदीब की बूढ़ी मां , उसके दोनों बच्चे मन्नत , अज़ान और उसकी बीवी, की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी  मंजीत और अनुराग ने उठा रखी थी। एक लड़की  के जन्म के लिए मंजीत की बीवी जसप्रीत ने ना जाने कितनी बार गुरुद्वारे में मत्था टेका था। और अनुराग की पत्नी सुरभि ने  ने मां दुर्गा की चौखट पर माथा रगड़ा था। तब जाकर उनकी मन्नत पूरी हुई और अदीब की बेटी ने जन्म लिया और बिना किसी सोच विचार के उसका नाम मन्नत पड़ गया। मन्नत को गोद में लेने के लिए अक्सर आदर्श ,अज़ान और दलजीत में झगड़ा हो जाता। ईदी हो या रक्षाबंधन, या वीरजी से फरमाइश पूरी करवानी हो , मन्नत का पलड़ा हमेशा भारी ही रहता।

आज उसी मन्नत को देखने आने वाले थे , जसप्रीत और सुरभि ने मिलकर सारी तैयारियां पूरी कर ली थी। लस्सी , , देशी घी के तड़के वाली  दाल मखनी, मिस्सी रोटी , कलाकंद , रसमलाई , बादाम का हलवा, शाही पनीर, कोफ्ते और भी ना जाने क्या क्या।

लड़के वाले आ गए । उन्होंने मन्नत को देखकर हां भी कर दी ।सब बहुत खुश थे।लेकिन  इस तीन अलग अलग धर्मों का एक परिवार उन्हें फूटी आंख नहीं भाया । उन्होंने अदीब की बीवी जन्नत को अलग बुलाकर कहा

"बीबी, हमें समझ में नहीं आता, आप लोग इन विधर्मियों के साथ एक साथ कैसे रह लेते हो? एक साथ खाना पीना , अपनी रोटियां तक एक दूसरे से बांटना , मांसाहार से परहेज करना ये सब कैसे कर लेती हैं। हम मुसलमान हैं और वो लोग हिंदू और सिख। हमारा खानपान रहन सहन  अलग है और उनका अलग।आपके तो शौहर भी आपके साथ नहीं रहते।एक जवान बेटी को लेकर इन लोगों के साथ आप कैसे रह लेती हैं। खुदा ना ख्वास्ता कल को मन्नत बेटी के साथ या आपके साथ कुछ उल्टा सीधा हो गया तो आप क्या करेंगी? इतना यकीन किसी काफ़िर पर करना ठीक नहीं। मेरी मानिए तो आप यह मकान बेचकर अपनी बिरादरी के मोहल्ले में मकान ले लीजिए, जहां हमारे अपने लोग हैं अपनी सुरक्षा के लिए।"

जन्नत उनकी बातें सुनकर हैरान रह गई , कितनी गिरी हुई बातें बोल रहे हैं ये लोग। जब इन लोगों के मन में इतनी वितृष्णा है तो ये लोग मन्नत को भी अपने भाइयों से मिलने नहीं देंगे। अज़ान के दिल में दलजीत और आदर्श के लिए जहर भर देंगे। और फिर यही जहर भविष्य में नफरत में बदल सकता है। अदीब को मंजीत और अनुराग के साथ मिल जुल कर त्योहार नहीं मनाने देंगे। मुझे दलजीत और आदर्श की शादी में ढोलक नहीं बजाने देंगे।  नहीं नहीं ये ठीक नहीं है। उसने अपना दिल मजबूत करके एक फैसला लिया।

"देखिए आप जो लोग जो भी कह रहे हैं उसके जवाब में मुझे सिर्फ इतना कहना है कि हम लोग अलग अलग धर्म के जरूर हैं लेकिन उसके पहले हम सब भारतवासी हैं। ये हमारा परिवार है जिसमे हम हिंदू, मुस्लिम, सिख बनकर नहीं बल्कि भारतवासी बनकर रहते हैं। हमारे बीच भी बटवारा होता है लेकिन दिलों का नही, जमीन का नहीं,।
हम लोग खुशियां बांटते हैं, गम बांटते हैं अपनी रोटियां बांटते हैं। हमारी रोटी हमेशा साझी ही रहेगी। खुदा के वास्ते  आप उसे एक रखने की कोशिश मत कीजिए । और अब आप घर जाइए क्योंकि मन्नत अब आपके घर नहीं जाएगी।"

बाहर दरवाजे के पास खड़ी सुरभि और जसप्रीत की आंखें जन्नत की बात सुनकर गीली हो गई। वो खुश हो गईं कि उनकी रोटियां हमेशा साझी ही रहेंगी। कभी एक नहीं होंगी।
जय हिन्द जय भारत

संगीता शर्मा" प्रिया"