सदा रहते हो अपनी प्रिय चांदनी के संग,
घूमते रहते हो प्रिय सितारों के साथ।
सच कहूं तो मुझे तुमसे कभी-कभी इर्ष्या होती है,
कि चांदनी तुम्हें कभी उलाहना नहीं देती
अमावस का,
या कि फिर अंकशायिनी हो उठती है पूनम में।
ऐ चांद, तुम कितने खूबसूरत हो!
सदा निद्र्वन्द्व विचरते रहते हो नभ में,
ना ट्रैफिक की चिन्ता, ना पुलिस का डर,
ना भौं-भौं, पौं-पौं, न धुंएं का कहर,
कौन-सा फ्यूल यूज करते हो भाई।
ऐ चांद, तुम कितने खूबसूरत हो!
क्या तुम भी कभी उलाहना देते हो,
किसी को कि उसमें,
कितनी मात्रा में खोट और दाग हैं कितने?
कभी रोटी के लिए चांद लिखता हूं
कभी रोटी को चांद कहता हूं,
तुम तो समझ भी नहीं सकते मजबूरियां
तुम्हारे लिए मैं क्या-क्या कहता हूं।
ऐ चांद, तुम कितने खूबसूरत हो!
इतना अमरत झराते हो शरद की रात पूनम में,
मगर खुद क्यों ग्रस लिए जाते हो हर माह मावस में?
ऐ चांद, तुम कितने खूबसूरत हो!
🎂🎂प्रितम वर्मा 🎂🎂

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