अच्छा हूआ कि खत्म हुआ दिल्लगी का वो बेरंग सिलसिला, 
न मुहब्बत न नफरत, रस्मों रिवाज भी रहा बेहद ढीला,
पारावार की मौजों में उफनती रही चाहत की कश्तियां।
पर यकीं जानो तुझसे जुदा होके सुकून बहूत मिला।।

कारवां- ए- जिन्दगी आज गूजर ही गई उस मोड़ से,
निकल गई अब तो सारी हसरतें भी अपनी उस दौर से,
वक्त का वो मंजर यादों में जब मिला, बेरौनक ही  मिला।
अच्छा हुआ कि खत्म हुआ दिल्लगी का वो बेरंग सिलसिला।।

माना कि कांटों में खिलने वाले फूल से जज्बात थे हमारे,
पर हल्की हवा भी उड़ा दे उस धूल जैसे ख्यालात थे हमारे,
ज्वार भाटों से खौलते दिल, पर आंखों का रंग हरदम पीला।
अच्छा हुआ कि खत्म हुआ दिल्लगी का वो बेरंग सिलसिला।।

पतझड़ में भी रौशन  हुआ करती थी जहां कभी वो बहारें,
ज़ालिम जमाने की नजरों ने गिरा दी सब सुनहरी वो दीवारें,
विरान राहों पर दिखता है चारो ओर खंडहरों का टीला।
अच्छा हुआ कि खत्म हुआ दिल्लगी का वो बेरंग सिलसिला।।

रुसवा न मैंने किया कभी तुझे न तूने ही किया कहीं कोई दावा,
बस उतरता रहा सीने में, जाने क्यों सुलगता हुआ इक लावा,
न दर्द की दास्तां रही दोस्त न ही रहा कोई भी शिकवा गिला।
अच्छा हुआ कि ख़त्म हुआ दिल्लगी का वो बेरंग सिलसिला।।
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मौलिक व स्वरचित:- कीर्ति रश्मि "नन्द( वाराणसी)