हर नारी के मन के अंदर,
इक नृत्यांगना रहती है,
नृत्य एक साधना है,
हर भाव-भंगिमा सधी हुई,
नृत्यांगना जब नर्तन करती है,
हर अंग पर अंकुश होता है,
मन साधक सा एकाग्रीत होकर,
नृत्य साधना करता है,
नारी भी एक नृत्यांगना जैसी,
जीवन के पथ पर चलती है,
हर पग उसका सधा हुआ,
नर्तन करते जैसा लगता,
जीवन रूपी झंझावात में,
मन पर अंकुश,
पग-पग पर अंकुश,
संस्कार बेड़ियां,
घुंघरू बनकर,
बजते रहते,
लोगों को हर्षित करते,
पर नारी के मन के रिसते घावों को,
कोई नहीं सुना करता,
घुंघरू की झंकारों में,
मन की पीड़ा कौन सुने ??
हंसती भाव-भंगिमा उसकी,
मन की पीड़ा को ढंक लेती,
लोगों की आंखों में खुशियां देखे,
अपने आंसू को पी जाती,
नृत्यांगना बनी हुई नारी,
जीवन रूपी संगीत के धुन पर,
नृत्य साधना करती जाती ।।
डॉ कंचन शुक्ला
स्वरचित मौलिक

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