मई, जून के महीने में खेती का काम थोङा कम हो जाता है। फसल कट जाती हैं। खेत खाली हो जाते हैं। हालांकि कुछ सब्जी तथा और भी फसल थोङे समय के लिये बोई जा सकती हैं। पर अध्यात्म का भी अलग महत्व है। खासकर ग्रामीण अंचलों में। विचार धारा यही है कि कमाना तो जीवन भर लगा रहता है। थोङा बक्त भगवान को भी देना चाहिये।
रायपुरा एक छोटा सा गांव (काल्पनिक नाम। यदि किसी गांव के नाम से मिलता है तो यह महज संयोग है), उसकी भी यही कहानी है। गर्मी के दिनों में बङे स्तर पर कथा होती। पंडित जी को अपार दक्षिणा मिलती। भले ही गांव बाले पूरी साल मेहनत करके कमाते पर धर्म कर्म में कोई भी पीछे पग न धरता। तभी तो धनी किसानों के खेतों में मजदूरी करके पेट भरने बाले रामू ने भी कथा में पूरे १००१ रुपये की दक्षिणा चढाई। दूसरे भी कई मजदूरों ने अच्छी दक्षिणा दी। आखिर ईश्वर को चढावा चढाने में कंजूसी कैसी। ईश्वर के ही संतान हैं। जो मिला है, सब ईश्वर का ही है। त्याग ही सुखी जीवन का आधार है। दान देने से घटता नहीं है, कई गुना होकर फिर से मिलता है। वैसे ये अच्छी बातें उस कथा का हिस्सा थीं जो गांव बालों ने पंडित जी से सुनी थी। फिर कई गुने के लोभ में किसी ने भी चढावा चढाने में कमी न रखी।
ईश्वर के घर देर है पर अंधेर नहीं। वैसे तो मजदूर हर साल अपनी सामर्थ्य से बहुत ज्यादा कथा में चढावा चढा रहे थे। हर साल सोचते कि कब उनके चढावे का कई गुना उन्हें वापस मिलेगा। पर ईश्वर भी हर साल मजाक कर जाते। फिर भी ग्रामीणों की वापसी की उम्मीद कभी खत्म न होती। वैसे भी जब वापसी का खाता ईश्वर खोलते होंगें तो शुरुआत तो ज्यादा देने बालों से ही करते होंगें। पर इस वर्ष उनका भी नम्बर आ गया। एक असंभव सी घटना घटी। आज तक मजदूरों ने जितना भगवान पर खर्च किया था, उसका दसियों गुना तो नगद मिल रहा था। और भी बहुत आने की उम्मीद दिख रही थी।
मजदूरों की तलाश में शहर से कुछ एजेंट आये थे। खास बात यह थी कि वे किसी विदेशी कंपनी के कर्मचारी थे। भारत में तो आवादी बेहिसाब बढ रही है। पर कई देशों में आज भी इंसान गिनती भर के हैं। वहाॅ के रईस लोग कई फैक्ट्री, खान, दसियों हजारों हैक्टेयर जमीन के मालिक हैं। भले ही अधिकांश काम मशीनों से करते हैं पर कुछ मजदूर तो चाहिये ही। तो सस्ते मजदूरों की तलाश में अधिक आवादी बाले देशों का रुख करते हैं। गरीब मजदूरों को मिलने बाली मजदूरी कितनी भी लगे पर उन देशों में मजदूरी दर के सापेक्ष यह बहुत सस्ते का सौदा होता है। वैसे तो लेखक को चाहिये कि वह पाठकों को स्पष्ट करे कि किस देश की कंपनी के एजेंट गांव में आये। पर अनेकों कानूनी अङचनों के कारण वह देश का नाम लिखकर मुसीबत में पङना नहीं चाहता। पर अपनी तरफ से पाठकों को विश्वास दिलाना चाहता है कि कहानी की कथावस्तु जैसी कई घटनाएं वास्तव में सच निकली हैं। तथा हर घटना की पृष्ठभूमि अलग अलग देश थे।
गरीब मजदूरों ने इकट्ठे दो लाख रुपये कभी देखे नहीं थे। फिर ऊंची मजदूरी की बात सुन कौन पीछे हटता। हालांकि उस देश की मंहगाई की बात मजदूरों से छिपा दी गयी। भारत में तीन सौ रुपये रोज मजूरी के मिलते हैं। महीने में हर रोज मजूरी मिलती भी नहीं। पर पांच हजार रुपये रोज की मजूरी वास्तव में बहुत ज्यादा लगी। फिर कंपनी की तरफ से मुफ्त में रहने और खाने की सुविधा भी मिलेगी। जब रहने और खाने पर खर्च करना ही नहीं है तो सारी मजूरी बचेगी। थोङा बहुत खुद पर खर्च भी कर दिया तो भी क्या फर्क है। बस इकलौती समस्या थी कि मजदूर को अकेले ही जाना होगा और चार साल तक वापस नहीं आ सकता है।
रामू के घर में विचार विमर्श चल रहा था। रामू की औरत मुनिया पढी लिखी तो ज्यादा न थी पर स्त्रियों की खूबी है कि उन्हें अनहोनी दूर से दिखने लगती है। कई प्रश्न उसके मन में चल रहे थे। हो सकता है कि रामू कभी वापस ही न आये। विदेश इतना भा जाये कि वापसी की न सोचे। कुछ दिन पैसे भेजकर फिर पैसे भेजना भी बंद कर दे। रामू को परदेश में कोई औरत अच्छी लग गयी तो फिर तो क्या कहने। वहीं व्याह कर रहता रहेगा। सही बात है कि स्त्रियों के मन में संदेह का कीङा होता है।मुनिया ने रामू को ऐसे ही इजाजत नहीं दे दी। पहले हाथ में गंगाजली पकङाई। फिर जो संदेह वह कर रही थी, उन सबकी शपथ रामू से दिलाई। रामू परदेश में किसी दूसरी औरत को देखेगा भी नहीं। जब खाने और रहने का खर्च कंपनी उठायेगी तो हर महीने थोङा जेबखर्च निकालकर पूरा पैसा घर भेजेगा। चार साल पूरे होते ही घर वापस आ जायेगा। रामू भी स्त्रियोचित भावनाओं को सोच मन ही मन मुस्करा रहा था। पर जो होने बाला था, न तो मुनिया और न रामू वहाॅ तक सोच सकते थे ।
कुछ महीनों की कार्यवाही के बाद आखिर वह दिन आ गया जब रामू को विदा होना था। वैसे गांव से तीन और लङके भी जा रहे थे। सोहन, सुरेश और पंकज के घर में भी खुशी और गम का मिश्रित माहौल था। मुनिया की आंखें बरबस बरसने को तैयार हो रही थीं। पर गांव बालों का विश्वास कि आदमी के बाहर जाते बक्त औरत को रोना नहीं चाहिये , मुनिया को मजबूत बना रहा था। मुनिया मजबूत बन रही थी, चार साल अकेले जीवन काटने के लिये। अकेले दोनों बच्चों की परवरिश करने के लिये।
आखिर रामू चला गया। मुनिया और बच्चों का जीवन खुशियों से भरने के लिये चार साल के वनवास पर रामू के निकलते ही मुनिया की आंखें बरसने लगीं। मुनिया ईश्वर से प्रार्थना करने लगी कि रामू चार साल का वनवास काट घर वापस आ जाये। पंडित जी कथा में सुना रहे थे कि पांडव वनवास के बाद अज्ञातवास पर चले गये थे। फिर उन्हें कोई ढूंढ नहीं पाया था। जब राजा दुर्योधन भी पांडवों को अज्ञातवास में तलाश न पाया तो मेरी क्या बिसात कि परदेश गये आदमी को तलाश पाऊं।
क्रमशः अगले भाग में.....
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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