बेरुखी में इस तरह वो आजमाते  हैं मुझे।
वो तड़प के और ज्यादा तोड़ जाते हैं मुझे।(१)

चाहतों का देखिए तो ये मजा भी है जुदा,
साथ हैं पर रोज तन्हा छोड़ जाते  हैं मुझे ।(२)

खिलखिलाते से नजर आते रहे वो आज कल,
कहर से अक्सर जमाने  के बचाते हैं मुझे ।(३)

ये हुनर भी इक नया ही देखने को है मिला,
पूछ कर मुझसे ही बातें तो बताते हैं मुझे ।(४)

पूछ  लेते  हैं  कभी  वो  हाल  मेरा  भूल से  ,
चोट खाकर भी मगर मरहम लगाते हैं मुझे।(५)

राह की वो धूल इक समझा  कभी था जो हमें भी,
आग बन  के खाक में  अक्सर मिलाते हैं मुझे ।(६)

बेरुखी कुछ बेबसी कुछ कश्मकश है कुछ दिखी,
नाम  मेरा  रेत  पर  लिख कर  मिटाते  हैं मुझे।(७)

वक्त तेवर ही बदलता है नया इक रूप ले,
रोज ही इल्जाम से इक तो सजाते है मुझे ।(८)

वो जरा बहके हुए से कुछ नजर हैं आ रहे,
इक कहानी भी जुदा ही अब सुनाते हैं मुझे।(९)

आज बेगानी छुवन सी है निगाहों में तेरी,
कौन है  जिसके लिए वो भुलाते  हैं मुझे।(१०)

जिंदगी "बेफिक्र" तन्हा बीत ना जाए कही,
छोड़ दो जिद यार इतना क्यों डराते  हैं मुझे ।(११)
~रंजन लाल "बेफिक्र"✍️