ब्याह दिया मां बाबुल तुमने
मुझे नया संसार दिया
नए रिश्तों से बंधकर मुझसे
मेरा नया साक्षात्कार हुआ
विदा हुई तो सबने बोला
अब दो कुल की तू रौनक है
आते रहना बेटी पीहर अपने
पर क्या अब वापसी सम्भव है?
जो सीख दी माँ बाबा तुमने
उन संस्कारों की राशि लिए
निकल पड़ी पिया के संग में
उनके हाथों में हाथ लिए
प्यारे भाई भौजाई तुम्हारे लाड़ का
जीवन में कोई न विकल्प है
पर अब चली में देस पराए
क्या अब वापसी सम्भव है?
सखियां,बहनें,काकी-काका
ये घर आंगन, मेरे खिलौने
ले जा रही हूँ सँजोकर
आँखों में जैसे सपन सलोने
इस घर की बेटी थी पहले
पर जरूरी सासरे के अब फर्ज हैं
आऊंगी मान से अतिथि बनकर
हाँ,अब वापसी यूहीं सम्भव है।
✍️प्रीति ताम्रकार
जबलपुर मप्र

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