आवाज हमें साफ साफ सुनाई दे रही थी । मां चुपके चुपके हम दोनों से कह रही थी-
"हमारे गर्भ में चाहे बेटियां हों या बेटे , हमारी गोद में तुम दोनों के लिए बराबर प्यार दुलार मिलेगा। हम कभी कोई भेदभाव नहीं करेंगे अपने बच्चों में। तुम लोग चिंता मत करना, जब तक हम जिंदा है तुम दोनों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। एक मां के लिए उसकी हर संतान प्यारी होती हैं। चाहे वो बेटी हो या बेटा।"
ये सुनकर न जाने क्यों हमको बहुत अच्छा लग रहा था। भगवान जी सच कहते थे। मां तो सचमुच बहुत अच्छी होती है। हमारे साथ वाले पिंड को कैसा लगा हम नहीं जानते क्योंकि वो तो हमेशा सोए हुए रहते थे। बहुत आलसी थे वो। धीरे धीरे चार महीने बीत गए। हमने देखा कि हमारे नन्हें नन्हें हाथ पैर निकल आएं हैं। नन्हा सा मुंह, भी बन गया है छः महीने होते होते तो हम दोनों शैतानी भी करने लगे थे। मां को बहुत परेशानी होती। वो बहुत थक जाती थी। घर में अक्सर हमारी शैतानियों की जांच करने सफेद कोट वाले आदमी आने लगे थे। जिनके हाथ में लंबी सी रस्सी होती और उस पर कुछ लगा हुआ था जिसे वो मां के पेट पर रख देते। हम लोग अपने हाथ पैर चलाते तो वो खुश होकर मां से कहते कि चिंता की कोई बात नहीं है ,सब कुछ ठीक है। जिस दिन हम लोग सोचते कि आज हम लोग शैतानी नहीं करेंगे मां परेशान हो जाती हैं और चुपचाप शांत बैठे रहते उस दिन मां बेचैन रहती थी , बार बार अपनी मां साहेब से पूछती कि आज हमारे पेट में हलचल नहीं हो रही है ।ये सुनकर उनकी मां साहेब भी परेशान हो जाती । और फिर उसी सफेद कोट वाले आदमी (जिसे सब लोग डॉक्टर कहते थे) को बुलाया जाता, वो भी परेशान हो जाता , मां की मां साहेब जिन्हें मां हमारी दादी सा कहती थी वो डॉक्टर को खूब चिल्लाती। और डॉक्टर जो हुकुम जो हुकुम कहता रहता। हम दोनों अंदर की दुनिया में खूब मजा लेते। लेकिन जब महसूस करते कि हमारी मां साहेब रो रही हैं । और दादी सा उन पर गुस्सा कर रही हैं तो हम लोग फिर से अपने हाथ पैर हिलाना शुरु कर देते और जब मां साहेब को महसूस होता कि हम दोनों लात चला रहे हैं तो वो खुश हो जाती और दादी सा से कहती
"मां साहेब... मां साहेब... सब ठीक है । मेरे दोनों बच्चे बिलकुल ठीक है, अभी उन दोनों ने लात मारी।"
दादी सा भगवान जी को लाख लाख धन्यवाद देती। हमें भी उनकी याद आ जाती , और सोचने लगते कि कब निकलेंगे हम लोग इस अंधेरी दुनिया से।
सातवें महीने में मां साहेब की गोदभराई हुई। हम भी बहुत खुश थे क्योंकि हमारी मां साहेब बिलकुल दुल्हन की तरह तैयार हुई थीं। हम उन्हें देख तो नहीं सकते थे लेकिन हमें उनकी खुशी महसूस हो रही थी। बहुत से मेहमान आए थे और सबने मां साहेब को आशीर्वाद दिया कि
"दूधो नहाओ पूतों फलो "किसी ने नहीं कहा कि पुत्रियों फलो। तब तक हम जान चुके थे कि हम मां साहेब की बेटी हैं और हमारे साथ वाला बेटा। हम राजपूतानी है और वो राजपूत। क्योंकि हम दोनों में सारे अंतर स्पष्ट हो चुके थे। हमें थोड़ा सा बुरा लगा। लेकिन हमने ज्यादा नहीं सोचा। अभी तो हम अपनी दुनिया से बाहर आए भी नहीं हैं अभी से क्या टेंशन लेना। जो होगा देखा जाएगा। हमारे साथ वाला तो चैन की बंशी बजा रहा था। बस वो या तो सोता या खाता। मोटू और आलसी कहीं का। अक्सर हमारे हिस्से का भी भोजन खा जाता। लेकिन हम कमजोर नहीं हुए । हम फुर्तीले बन गए थे।
एक दिन हम सो रहे थे तभी अचानक तेज दर्द की लहरें उठने लगी। हम और मेरे साथ वाले जिस घर में रहते थे वो दीवारें हिलने लगी हम दोनों इधर उधर घूमने लगे , हमारे साथ वाले के तो गले में वो रस्सी ही फंस गई। उसको बहुत तकलीफ हो रही थी। हमसे देखा नहीं जा रहा था , तकलीफ तो हमें भी बहुत हो रही थी लेकिन हम बर्दाश्त कर ले रहे थे , क्योंकि हमारी तकलीफ से बढकर तो मां साहेब की तकलीफें हमें रुला रही थी। हम दोनों के जन्म से उन्हें इतनी तकलीफ हो रही थी कि उनसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। घर में जो डॉक्टर आई थीं वो भी घबरा गई और उन्होंने मां साहेब को अस्पताल ले जाने को कहा। लेकिन हमारी दादी सा इसके लिए तैयार ना हुई। उनके खानदान की किसी औरत का चेहरा बाहर के किसी व्यक्ति ने नहीं देखा था तो वो अपनी बहू को इस हाल में बाहर ले जाने की इजाज़त कैसे दे देती? इसी उधेड़बुन में और समय बीत गया। हमारे साथ वाला राजपूत तकलीफ से नीला पड़ रहा था । नाजुक कहीं का । हम तो सब बर्दाश्त कर ले रहे थे। क्योंकि हम लड़की जो थे और ऊपर से राजपूतानी । अपनी मां साहेब की तरह मजबूत थे ना। लेकिन मजबूत चट्टान सी दिखने वाली हमारी मां साहेब की चीखों से आज कमरे की दीवारें हिल उठी। उस राजपूत के गले में रस्सी फंसी होने की वजह से वो निकल ही नहीं पा रहा था। तभी हमें थोड़ा सा प्रकाश दिखाई दिया । और हम ऊ मां ऊ मां की आवाज लगाते हुए बाहर आ गए । हैरान हो गए हम कि हमें देखकर सबका मुंह लटक गया। डॉक्टर ने डरते डरते दादी सा से कहा
"हुकुम, बेटी हुई है ।"
अब तो हम देख सकते थे ना । हमने देखा कि दादी सा वही पर सिर पकड़ कर बैठ गई और मुंह बनाकर बोली
"छोरी हुई से... करमजली ... निगोड़ी... वंश नाश कर दिया छोरी ने । अब हमारा कुलदीपक कैसे जलेगा? कितनी आस लगाए बैठे हुए थे हम। लेकिन भगवान को दया को नी आई। मारा राजपूत वंश बिना वारिस के ही रहेगा के ?अब मारा बेटा के करेगा । हे भगवान।"
अभी 1 मिनट भी नहीं बीता था कि तभी हमारे साथ वाला भी कहां कहां की आवाज लगाता हुआ बाहर निकल आया। उसे देखकर हमें हंसी आ गई। एकदम दुबला पतला कमजोर सा था वो। और हम स्वस्थ और गोरे चिट्टे थे। लेकिन एक बात हमारी समझ में नहीं आई.......
क्रमशः
लेखिका -
संगीता शर्मा

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