कभी संवेदनाओं से सिचा वह गांव वीरान न था। गांव बाले दुख और सुख को झेल लेते थे। सहयोग वह गुण है कि जो निराश के मन में भी आशा का दीप जला देता है। फिर हारे हुए की भी जीत हो जाती है। वैसे भी लोह दुर्ग पर भी लगातार हथोड़े की बरसात की जाये तो कभी न कभी तो वह दुर्ग भी टूट जाता है। मानव की साहस की अनेकों गाथाएं हैं। पर्वतों को काटकर मार्ग निकालना, नदी के प्रवाह को मोड़ देना, बंजर भूमि पर भी अन्न उपजा देना, मनुष्य चाहे तो उसके लिये क्या असंभव है।

   नैपोलियन के शव्द कोष में असंभव शव्द न था। मथुरा जिले में राया के पास बसे गाॅव के बाशिंदों की भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। लगातार उन्नति की तरफ बढता हुआ वह गांव एक दिन वीरान हो गया। छोड़ गया कुछ निशान। जिन्हें पढकर कोई कह सकता था कि कभी यहाॅ कोई बस्ती थी। पर फिर अचानक वह बस्ती उजड़ गयी। छोड़ गयी एक दर्दनाक कहानी। साथ ही एक यक्षप्रश्न। वास्तव में गांव कब वीरान हुआ था। क्या तब जब वहां के नागरिक गाॅव छोड़कर भाग रहे थे। अथवा उससे पहले ही वह गॉव वीरान हो चुका था। 

   कहानी कहो या कहो किंवदन्ती। पात्रों के भी नाम नहीं हैं। कोई जरूरत भी नहीं है। वीरान गांव के पात्रों का क्या नाम लेना। यदि कहानी लिखने के लिये कोई कल्पना का प्रयोग कर दिया तो संभव है कि कोई अच्छा नाम भी अछूत बन जाये। 

  न कोई बाढ आयी। न आग लगी। न कोई प्राकृतिक आपदा आयी। पर बसा बसाया एक गांव वीरान हो गया। शायद ऐसे अनेकों नुकसान को मनुष्य झेल लेता है। शायद विनाश के बाद फिर से सृजन हो सकता है। पर कुछ विनाश ऐसे होते हैं जो वास्तव में तबाही ला देते हैं। 

   गांव में एक संत का आगमन हुआ। लोगों के मन में उनके लिये श्रद्धा जगी। धर्म की अच्छी व्याख्या कर लेते थे। बड़ी बात थी कि गांव बालों को उन्हीं के हिसाब से सरल शव्दों में समझा भी देते थे। 

  भोले भाले गांव बाले संत से सलाह लेते। उनके वाक्यों पर अमल करते। 

   जैसे दैत्यों के कुल में प्रह्लाद पैदा हो गये थे, उसी तरह कई बार अच्छे परिवारों में भी बुरे व्यक्ति पैदा हो जाते हैं। नीच भी अच्छाई का चोला पहने रहते हैं। 

  संत से एक साधारण सा प्रश्न। 

  " महराज। मेरी घोड़ी की बेटी अब जवान हो गयी है। उसकी सवारी करने में कोई बुराई तो नहीं है।" 

  " इसमें क्या दिक्कत है।" संत का साधारण उत्तर। 

  " महाराज। एक बार फिर से सोच लिजिये। उस घोड़ी की भी सवारी मैने बहुत की है। क्या घोड़ी की बेटी की सवारी की जा सकती है। "

   " क्यों नहीं की जा सकती है। घोड़ी के बाद उसकी बेटी की और उसकी बेटी के बाद उसकी बेटी की भी सवारी की जा सकती है। आखिर आदमी घोड़ी पालता ही है, सवारी के लिये। "

  अनेकों बार शव्द महत्वपूर्ण नहीं होते। भाव महत्वपूर्ण होते हैं। एक ही वाक्य के अनेकों अर्थ हो सकते हैं। 

  उसी रात उस गांव के वीरान होने की दास्तान शुरू हो गयी। रात में एक बेटी अपने ही पिता की दरिंदगी का शिकार बन गयी। दुखद बात यह रही कि परिवार भी दोषी पिता को बचाने में लगा रहा। आत्मग्लानि में भरी बेटी ने अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर ली। 

    फिर कुछ अनहोनी घटनाएं होने लगीं। हर घर में कुछ न कुछ आपदा आने लगी। बसा हुआ गांव उजड़ने लगा। एक दिन वीरान हो गया। फिर वही यक्ष प्रश्न। वह गांव कब वीरान हुआ। शायद उसी समय जब एक पुरुष की कामुकता एक पिता के फर्ज पर भारी पड़ गयी। शायद उसी समय जब एक माॅ अपनी बेटी का साथ देने के बजाय उसे चुप रहने की सीख दे रही थी। शायद उसी समय जब गलत को गलत कहने के बजाय गांव की प्रतिष्ठा ज्यादा महत्व की बन गयी थी। 

    संभव है कि यह पूरी किंवदन्ती झूठ हो। पर ऐसे वीरान गांवों का अस्तित्व झूठ नहीं है। मनुष्यों के रहने पर भी मानवीय मूल्यों से गिरे हुए ऐसे अनेकों गांव और शहर भी मौजूद हैं जिन्हें आबाद कहना वास्तव में आबाद शव्द को अपमानित करना है। वीरान गांवों और वीरान शहरों की एक लंबी श्रंखला है। 

समाप्त 
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'