गालियां उनकी न छोड़ी जाए
माए नी कोई तो सम्मान दिलाए
एक तरफ है पीहर की बचपन की यादें
माए नी ससुराल में उम्र बीत जाए ।
सांझ जीवन की हो न जाए
माए नी रोशनी कोई राह दिखाए
आते जाते भव सागर की लहरें डर दिखाएं
माए नी छोटी ही सही नाव मिल जाए ।
छोटी छोटी कहानियां जिसकी बन जाए
माए नी द्वंद्वों के फंदे बहुत सताए
सम्मुख परिस्थितियां दहके अंगारे बन जाए
माए नी शीतल ब्यार सुकून सा साथ वो हो जाए।
दीवार के पार जलता दीपक ओझल हो जाए
माए नी हौसलों की ओर वहीं ले जाए
लाख़ बाधा जमीन आसमान एक न हो जाए
माए नी आत्मा से आत्मा के मिलन को कौन मिटाए ।
© रेणु सिंह" राधे " ✍️
कोटा राजस्थान

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