पिछले भाग में आपने पढ़ा कि सुबह 4बजे की पूजा का बोलकर गुरुजी वापिस चले जाते हैं।पीहू और कौशल्या सारी रात एक-दूसरे के साथ बातें करके गुजार देते हैं,अब आगे-
अब वहाँ पर वो गुरु जी आते हैं और हॉल में एक बड़ा सा हवनकुंड बनाते हैं।अब वो एक चक्र बनाकर उसके बीच मे पीहू,नीरज और कौशल्या को बिठा देते हैं!अब वो हवन शुरू करते हैं और मंत्रों का उच्चारण भी करने लगते हैं।हवन की अग्नि धीरे-धीरे बहुत तेज होने लगती है और मंत्रों की शक्ति से छाया भी अब तड़पने लगती है।
जैसे-जैसे मन्त्र पढ़े जा रहे हैं वैसे-वैसे छाया की तड़प बढ़ रही है।वो अब तड़पते हुए शीशे में से बाहर निकल आती है।उसके बिखरे बाल उसे ओर भी ज्यादा डरावना बना रहे हैं।वो तड़प रही है लेकिन बाहर हॉल में नही जा रही है और खुद से ही बातें किये जा रही है।छाया चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है नही आऊँगी बाहर चाहे तो कितने ही मन्त्र पढले।
दूसरी ओर, अब गुरुजी उस हवन कुंड में सिंदूर,चावल और एक साबुत नारियल डालते है जिससे छाया अब ओर भी तड़पने लगती है और ना चाहते हुए भी एक भयंकर रूप में गुरुजी के सामने आ ही जाती है।उसके आते ही चारों ओर अँधेरा फैल जाता है और केवल हवन कुंड की अग्नि की रोशनी ही रह जाती है।लेकिन उस हवन कुंड की अग्नि की रोशनी इतनी अधिक थी कि उसमें छाया को आसानी से देखा जा सकता था।अब उस सभी की नजर उस भयानक चुड़ैल छाया पर जाती है।उसके हाथ-पाँव मुड़े हुए हैं और वो एक छिपकली की तरह रेंगती हुई उन सभी के सामने आती है।
उसका चेहरा बालों से ढका हुआ है और शरीर मे से ऐसी इतनी गन्दी बदबू आ रही है कि जिसको सहन करना ही बहुत मुश्किल हो रहा है।अब वो ठीक गुरुजी के सामने आकर सीधे होकर बैठ जाती है और अपने बालों को भी चेहरे से हटा लेती है!छाया और गुरुजी अब आमने-सामने है और उन दोनों के बीच में हवनकुंड की अग्नि प्रवाहित है! गुरुजी के एक तरफ एक सुरक्षाकवच में नीरज,पीहू और कौशल्या बैठे हुए सब देख रहे हैं!नीरज और कौशल्या ने आज पहली छाया को देखा है,वो भी इतने भयंकर रूप में।अब छाया गुरुजी से कहती है तूने क्यों बुलाया है मुझे?
गुरुजी छाया से कहते हैं तो इन निर्दोष इंसानों को क्यों परेशान कर रही है?जा चली जा इन सभी की जिंदगी से।
अब छाया जोर-जोर से हँसने लगती है और कहती है कि नीरज को मैं अपना पति मान चुकी हूँ इसीलिए मैं अपने पति को छोड़कर कहीं नही जाऊँगी।ये कहकर पीहू जोर-जोर से हँसने लगती है और उसकी हँसी उस माहौल को ओर भी डरावना बना देती है।
नीरज तेरा नही पीहू का पति है और उसपर सिर्फ उसी का हक है।गुरुजी उसे समझाने का प्रयत्न करते हैं।
लेकिन छाया कुछ समझना नही चाहती है और वो कहती है नही नीरज सिर्फ मेरा है! पूछो इस पीहू से ,क्या इसे ये भी याद है कि आखिरी बार ये नीरज के करीब कब आई थी?नीरज को पत्नी का सुख मैंने दिया है ना कि पीहू ने!उसके गर्भ में जो बच्चा है वो भी मेरा और नीरज का है,सिर्फ इसे जन्म पीहू देगी!अब तुम ही फैसला करो कि मुझे जाना चाहिए या पीहू को?
लेकिन नीरज एक मनुष्य है और तू एक चुड़ैल,तुम दोनों का कोई मेल नही हो सकता है,गुरुजी कहते हैं।
अगर मेल ना होता तो हमारे अंश का अस्तित्व कैसे बनता,बोलो?छाया भी अपनी जिद पर अड़ी रहती है।
गुरुजी भी उसे निरन्तर समझाने का प्रयास करते हैं लेकिन जब वो नही मानती तो अब क्रोधित होकर कहते है तो ठीक है दुष्ट आत्मा,आज मैं तेरा ये किस्सा ही खत्म कर देता हूँ।आज मैं तुझे खत्म करके तुझे मुक्ति दिलवाकर ही रहूँगा!ये बात सुनकर छाया जोर-जोर से हँसने लगती है और कहती है कोशिश करके देख ले।
अब गुरुजी अपने कमंडल में से कुछ जल निकालते हैं और उसमे मन्त्र पढ़ते हुए पूजा का सारा सामान डाल देते हैं।वो उसमे सिंदूर,चावल और वभूती मिला देते हैं और छाया के ऊपर छिड़कने लगता है कि तभी छाया गायब हो जाती है।अब चारों ओर अँधेरा है और सिर्फ उसकी हँसी की आवाज आ रही है।
अब गुरुजी कहते हैं अच्छा तो तू अब मेरे साथ आँख-मिचौली खेलेगी?अब गुरुजी नीरज,कौशल्या और पीहू को सावधान करते हुए कहते हैं कि कोई भी चक्र से बाहर नही निकलेगा,वो चुड़ैल सभी को भृमित करेगी,सावधान।
सच मे वही होता है जिसका गुरुजी को डर था।कौशल्या को अँधेरे में महसूस होता है जैसे नीरज रोते हुए उसे पुकार रहा हो,माँ,मुझे बचालो ।ये चुड़ैल मुझे जान से मार देगी।कौशल्या डर से जैसे ही मुड़कर देखती है तो उसका एक पाँव चक्र से बाहर आ जाता है।छाया उसे अपनी ओर खींच लेती है।अब छाया उसे गर्दन से पकड़ कर उठा लेती है और कौशल्या तड़पने लगती है।कौशल्या को बचाने के लिए गुरुजी को अपनी पूजा बीच मे ही छोड़नी पड़ती है।जैसे ही गुरुजी मन्त्र पढ़ना छोड़ते हैं और छाया की ओर बढ़ते हैं,वो कौशल्या को छोड़कर गायब हो जाती है।
अब छाया के गायब होते ही फिर से रोशनी हो जाती है और पीहू उस चक्र से बाहर आकर कौशल्या को सम्भालती है।
पीहू कहती है माँ आपको ज्यादा चोट तो नही आई?
नीरज भी बाहर आ जाता है और वो दोनों मिलकर कौशल्या को उठाकर सौफे पर बिठा देते हैं।
अब नीरज भी गुरुजी से माफी माँगता है और कहता है गुरुजी मुझे एक बात नही समझ आई?
बोलो बेटा क्या पूछना चाहते हो तुम?गुरुजी कहते है।
यही कि आपने ये पूजा रात को ना करवाकर सुबह के 4बजे ही क्यों करवाई?
अब गुरुजी कहते हैं रात के बारहा बजे से सुबह के साढ़े तीन तक दुष्ट आत्माओं,भूत-प्रेत,चुड़ैलें इत्यादि जितनी भी नकारात्मक ऊर्जाएं हैं उनकी शक्ति अपार होती है और साढ़े तीन से चार बजे तक का मिलाजुला समय होता है परन्तु सुबह चार बजे से इन नकरात्मक ऊर्जाओं की शक्ति कम हो जाती है लेकिन पूरी तरह से खत्म नही होती है।इसीलिए ये समय सही था पूजा का।इसीलिए उसे मजबूर होकर उसे यहाँ आना पड़ा!लेकिन उसकी शक्तियाँ अपार हैं जिसका सामना करना बहुत मुश्किल है मेरे लिए।
ॐ नमः शिवाय
🙏🙏🙏🙏🙏

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