क्या जीने के लिये केवल रोटी, कपड़ा और मकान ही आवश्यक हैं। निश्चित ही ये तीनों जीवन की मूलभूत आवश्यकता हैं। फिर भी इस तरह जीना तो बस जीना ही है। मनुष्य जीना आनंद से जीना चाहता है।
कहने बाले कहते हैं कि आनंद तो मन के भीतर होता है। यह बात उस समय सच लगने लगती है जबकि निर्धन और परेशान व्यक्ति भी आनंद के कुछ क्षणों में अपनी परेशानियों को भूल जाता है। पुत्र जन्म का अवसर हो या विवाह का अवसर, वह भी खुशी खुशी अपनी सामर्थ्य से ज्यादा खर्च कर देता है। नाच रंग देखकर वह भी कुछ क्षणों को अपने दुखों को भूल जाता है।
हालांकि परेशानियों के अवसर पर ये रास रंग बहुतों को नहीं सुहाते। जब खुद के ही खर्च पूरे न हों तो भला कौन मेलों में घूमने जायेगा। नौटंकियां भी सूनी होने लगती हैं। पर जब सब तरीके की शांति हो तो ऐसे आयोजनों के बहाने बनते हैं। त्यौहार हों या किसी महापुरुष की जयंती या बसंत का आगमन अथवा राजपरिवार में किसी का जन्म दिन, फिर तो मेलों की बहार आ जाती है।
सन १८५७ की होली ज्यादातर रियासतों में बहुत शांति से मनायी गयी। एक बड़ा भारतीय वर्ग अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चुपचाप इकट्ठा हो रहा था। विभिन्न रियासतों के राजाओं की गुप्त मंत्रणा हो रही है। बगावत की कुछ चिंगारी अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों के मन में भी जलने लगीं। पर गुलामी को ही अपना धर्म समझने बाले बाहनपुर के बाशिंदे इन सबसे बेपरबाह ज्यादा ही आनंद में मग्न थे। होली के बहुत दिनों बाद तक मेला लगा रहा। मेला धीरे धीरे हट गया पर ज्योति की नाटक मंडली अभी तक जमी रही। जब तक किसी नाटक मंडली को ग्राहक मिलते रहते हैं, वह जमी रहती है। तथा बाहनपुर में उस मंडली पर सिक्कों की थैली उछालने बालों की कोई कमी न थी।
ज्योति मंडली की मुख्य कलाकार तथा मंडली की निर्देशक हर रोज अलग अलग नाटकों का मंचन कराती। मंडली की स्त्रियां ही स्त्री और पुरुष सभी के किरदार निभाती थीं।
कह सकते हैं कि सुंदर स्त्रियों की उपस्थिति ही इस मंडली की सफलता का आधार थी। समाज में संयम के पुजारी बनने का दावा करने बाले भी चुपचाप ज्योति के नाटक का दीदार करने आते। स्त्रियों की अदाओं पर आह भरते। कुछ मनचले तो सीटियाँ भी बजाते। फिर जमकर धन वर्षा करते।
ज्योति यौवन की चौखट पर खड़ी, श्वेत वर्ण, सर से लेकर पैर तक सुंदरता में रति को भी मात करती। यदि उसके नैत्र व केश कृष्ण वर्ण के न होते तो वह कोई अंग्रेजी मैम ही लगती। केवल रूप में ही नहीं बल्कि स्वर और नृत्य कला में भी अग्रणी थी। नाटक के मध्य उसका सस्वर गान तथा अदाकारी भरा नृत्य अच्छे अच्छों को विचलित कर देता।
स्त्रियों पर तमाम पाबंदी लगाने बाले समाज की नजर में कलाजीवी महिलाओं के विषय में धारणा भी कोई बहुत अच्छी न थी। निश्चित ही ये पुरुषों पर अपनी रूप माधुरी से अपनी जीविका चलाने बाली वही स्त्रियां हैं जिन्हें समाज में रंडी कहा जाता है। पीढी दर पीढी नाच गाने के द्वारा आजीविका चलाती आयीं इन स्त्रियों का भले ही समाज में कोई स्थान न था पर समाज खुद उनकी चौखट पर नाक रगड़ता था, यह एक अलग ही आश्चर्य था।
नाटक मंडली की इन स्त्रियों का कोई अन्य उद्देश्य भी हो सकता है। संभव है कि ये स्त्रियां किसी कुलीन परिवार का हिस्सा हों। संभव है कि इन नाटकों का उद्देश्य भी सोते हुओं को जगाना ही हो। संभव है कि ज्योति की नाटक मंडली किसी बड़ी योजना का हिस्सा हो जिसके अनुसार अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी करते आये रियासतों की आवाम को देशप्रेम और आजादी का अलख जगाना इस मंडली का उद्देश्य हो। संभव है कि ऐसी साहसी महिलाएं अनेकों रियासतों में नाटकों के माध्यम से कुछ सीख देनी निकली हों। इन बातों को सोच पाने की स्थिति भी अभी बाहनपुर के नागरिकों की न थी। अभी तो वे राणा प्रताप के पहाड़ियों पर भटकने की, वीरमती चंपा के बलिदान की, पन्ना धाय द्वारा राज्य के लिये अपने पुत्र को बलिदान करने की, देवसेना द्वारा मालवा के उत्थान के लिये अपने प्रेम स्कंदगुप्त के परित्याग की, चंद्रगुप्त मोर्य द्वारा गुरु चाणक्य के निर्देश से पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने की नाटिकाओं को देखकर भी सीटी बजाने से बाज नहीं आते। नाटिकाओं का समापन ज्योति के एक प्रश्न से होता।
" बाहनपुर के बाशिंदों। आखिर छोटी सी बच्ची चंपा ने क्यों अपने प्राणों की आहुति दे दी।"
" मात्र दस वर्ष का बालक दुद्धा महाराणा को संदेश देने के लिये भागा गया। यह बताने के लिये कि राणा, आजादी के रण में आप अकेले नहीं है, वह मुगल सैनिकों को छकाता हुआ राणा के पास तक क्यों गया। "
" प्रत्येक स्त्री को अपना पुत्र प्राणों से भी अधिक प्यारा होता है। पर पन्ना ने अपने ही पुत्र चंदन की आहुति क्यों दे दी। "
पर इन प्रश्नों के उत्तरों पर विचार करने की क्षमता अभी बाहनपुर के बाशिंदों में न थी। उनकी नजर में ज्योति एक बेहतरीन नाटिका का बेहतरीन अंदाज में समापन कर रही है। फिर तालियों से ज्यादा सीटियों की आवाज से नाटक का समापन हो जाता।
ज्योति भी एक अलग ऐतिहासिक घटना का नाटकीय मंचन करने की तैयारी में लग जाती। यही सोचकर कि शायद कोई तो इन नाटकों का मर्म समझने बाला मिलेगा। बाहनपुर में कोई तो ऐसा होगा जो मन में व्याप्त गुलामी के अंधेरे को मिटाने बाला सूरज बनेगा। कोई तो होगा जिससे वह कह सकती है कि तुम्हीं तो वह सूरज हों, जिसकी तलाश में मैं यहाॅ आयी हूॅ। कोई तो ऐसा मिलेगा जिसे वह बता सकती है कि इस नाटक मंडली की सारी स्त्रियां कुलीन परिवारों की सदस्या हैं तथा वह स्वयं एक रियासत की राजकुमारी। कोई तो ऐसा होगा जो यह जानने की कोशिश करेगा कि ज्योति तथा नाटक मंडली की दूसरी स्त्रियों द्वारा समाज में निकृष्ट समझी जातीं स्त्रियों की भांति छद्म रूप रखने का क्या कारण है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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