"जानती हो बाऊजी को हल्वा बहुत पसन्द था "' रमेश ने अपनी पत्नी से कहा ।
आज हल्वा पूरी बनाकर धुप लगाना अच्छे से।
सुनीता चूल्हे पर दूध चढाते बोली हाँ हाँ जरूर बनाऊगी,ओर क्या पसंद था ये भी बता दो।
दोनो पति पत्नी अपने पिता ओर श्वसुर के श्राद्ध की तैयारी कर रहे थे।घर में भोज रखा ,रमेश ने अपने ससुराल वालों की खुब खातीरदारी की ।
सबने खाना खाया दोपहर हो गयी तभी अचानक रमेश को उस माँ की याद आ गयी जो अभी जिन्दा थी ओर पलंग पर लेटी अपने भोजन का इन्तजार कर रही थी ।
रूखी आंखो में अनगिनत प्रश्नों को समेटे ,बेबस ,लाचार एक माँ अपने पति का श्राद्ध देख रहो थी ,जिस बाप को बेटे ने कभी रूखी सुखी रोटी समय पर नहीं दी आज उसके मरने पर शाही भोज हो रहा था।
ये सब देखकर माँ किंचित यही सोच रही होगी ये श्राद्ध जीते जी क्यूँ नहीं होता ....................
कृष्णा की✍️ कलम से

0 टिप्पणियाँ