माँ अक्सर कहा करती थी मुझे बेटी नहीं चाहिए मुझे बेटियां नहीं पसंद है, सब लोग ये सुनकर उनका मज़ाक उड़ाते थे और कहते थे कितनी छोटी सोच है इनकी जो खुद औरत होकर बेटी नहीं चाहती ,लेकिन ये कोई नहीं समझ पाता था कि वो क्यों बेटी नहीं चाहती।
लेकिन ईश्वर की ऐसी कृपा की उन्होंने एक बेटी को ही जन्म दिया। बहुत प्यार करती थी वो अपनी प्यारी सी बच्ची से ,उसके माथे पर काजल से अक्सर चाँद सितारे बनाया करती थी और प्यार से उसे गुरली-मुरली बुलाया करती थीं। कभी बेटे से कम नहीं चाहा अपनी उस प्यारी सी बच्ची को फूल फूल की तरह अपनी गोद में हमेशा रखा करती थी।
पर फिर भी न जाने किस बात से वो बहुत डरा करती थीं, कि अक्सर हर रोज सुबह जल्दी उठने की आदत और संडे को कोई अच्छी सी डिश और गोल रोटी बनाना सिखाया करती थीं।
जब कॉलेज जाने लगी मैं ' ऐसा कुछ मत करना कि मेरी परवरिश पर उंगली उठे' ऐसा समझाया करती थीं, पर फिर भी वो मुझसे बहुत प्यार किया करती थी ।
फिर एक दिन कुछ लोग आए और कहने लगे बेटी बड़ी हो गई है शादी नहीं करोगी क्या इसकी? सब बहुत खुश थे बेटी की शादी की बात सुनकर माँ भी खुश थी पर फिर भी न जाने उनकी आँखों में कैसा डर था ?
इस चीज से आगे बढ़कर मैं भी बहुत खुश थी इसलिए क्योंकि सारी लड़कियों की तरह मेरे भी कुछ सपने थे अपने पति अपने जीवन साथी के साथ अपनी नई जिंदगी की शुरुआत कैसे करूंगी बहुत सारे सपने सजाए रखे थे । रिश्ता आया, बात बढ़ी फिर शादी का दिन तय हो गया शादी के दिन माँ ने मुझे संस्कार भरी कुछ बातें समझाईं उसके साथ एक बात कही कि "फूलों से सजे उस बिस्तर की खूबसूरती पर ना जाना, फूलों से सजे उस बिस्तर की खूबसूरती पर ना जाना फूलों में भी काँटे होते हैं और अभी लोगों को नहीं पहचानती हो तुम लोगों के बड़े मुखौटे होते हैं हर चेहरे के अलग मुखौटे होते हैं"।
इस बात की गहराई को मैं समझी ही नहीं और मुस्कुराकर हाँ ठीक है माँ कहकर बस अपनी शादी की रस्मों में डूब गई ।
शादी हो गई अब विदाई का समय आया, हमारे यहाँ एक रिवाज़ है कि बेटी की विदाई माँ नहीं देखती हैं माँ घर में थी मेरी विदाई हो रही थी पर मेरी गाड़ी आगे बढ़ते ही माँ बस ये कह कर रोने लगी कि हाय! मेरी बेटी को लेकर चले गए हाय! मेरी बेटी को लेकर चले गए।
ये बात मुझे तब पता चली जब मैं अपने ससुराल आ चुकी थी और सब मुझे फोन करके कह रहे थे गुड़िया तुम्हारी मम्मी ये कह रही थीं कि हाय! मेरी बेटी को लेकर चले गए, बड़ी खिल्ली उड़ाई सबने बड़ा मजाक उड़ाया और सबके लिए हंसी मजाक का मुद्दा था पर ये बात उन्होंने क्यों कही ये अभी तक कोई समझ नहीं पाया था।
मेरी शादी हुई मैं अपने ससुराल में थी । हर सुबह फोन की सबसे पहली घंटी जब बजती थी वो माँ होती थी। रोज़ पूछा करती थीं 'तुम खुश तो हो ना तुम्हें कोई तकलीफ तो नहीं अगर कोई बात हो तो मुझसे जरूर कहना' हर रोज मुझसे कहा करती थी और मैं हर रोज होती है कहती थी माँ क्यों परेशान हो अगर कोई परेशानी होगी तो मैं आपसे जरूर बताऊँगी पर सच तो यह है कि मैंने उनसे कभी भी कुछ बताया ही नहीं बस हमेशा खुश रहती थी यह सोच कर कि मेरी खुशी ही उनकी जिंदगी है मेरी हँसी ही उनकी जिंदगी है ।
फिर मेरी जिंदगी में एक नई खुशी ने दस्तक दिया जब मुझे ये पता चला कि मैं माँ बनने वाली हूँ। बहुत खुशी थी मुझे एक अनोखा अनुभव था एक माँ बनने का हर एक सेकेंड , हर मिनट, हर एक घंटा, हर एक दिन ,मुझे एक नई जिंदगी अपने अंदर पलती हुई महसूस हो रही थी। मुझे माँ बनने की एक अलग ही खुशी थी बहुत से सपने थे जब वह पहली बार मेरी उँगली पकड़ेगा। जब मैं माँ बन जाऊँगी तो मैं कैसे संभालूंगी कैसे करूंगी बहुत सी चीजें सोचे थे। बहुत सारे सपने थे फिर वो ख़ुशी का दिन आया जब मैंने उस बच्चे को जन्म दिया । बहुत अनोखा अनुभव था लेकिन वो खुशी वो हँसी मेरी जिंदगी में बहुत दिन तक नहीं रही। डेढ़ महीने हुए थे, तारीख 26 जनवरी जब सुबह 4:00 बजे मेरी आँखें खुली और मेरे हाथ मेरे बच्चे के सीने पर पड़े ,उसका दिल जो धड़कना बंद हो चुका था, आज आँखें खुली नहीं जैसे मेरे होश उड़ गए मैंने उसे बहुत तेज झकछोरा, उठाया हिलाया, सीने पर दबाया पर कोई प्रतिक्रिया नहीं, फटाक से मैंने इन्हें जगाया फिर हम दोनों हॉस्पिटल लेकर गए , डॉक्टर ने कहा वो जीवित नहीं है उसकी साँसे बंद हो चुकी हैं। मैं बता नहीं सकती कि उस वक्त कैसा लग रहा था मेरी हालत ऐसी थी कि मेरे कदम ना तो आगे बढ़ रहे थे ना पीछे मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे इस वक्त कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए ।
मैंने अपनी जिंदगी में कभी मृत शरीर नहीं देखा था जीवन में पहली बार देखा और अपना पहला बच्चा देखा। घर आए तो सुबह 4:00 बजे से 8:00 बजे तक का 4 घंटे का जो समय था मैं उसे लेकर बैठी रही फिर सब आए सारे संस्कार खत्म हुए और उसके बाद मैंने अपनी माँ के साथ कुछ दिनों के लिए वापस आ जाना ही सही लगा क्योंकि मुझे उस समय सिर्फ और सिर्फ अपनी माँ की बहुत ज्यादा जरूरत थी फिर अगले दिन सुबह मेरी फोन की घंटी बजी देखा तो मेरे पति का फोन था, मन में एक सहानुभूति और प्यार की उम्मीद थी कि मुझे अपने पति से प्यार और सहानुभूति जैसे शब्दों सुनने को मिलेंगे , लेकिन ऐसा हुआ नहीं मैंने फोन उठाया तो मेरे पति मुझपर आरोप लगाए जा रहे थे, कि मैं अच्छी पत्नी नहीं मैं अच्छी माँ नहीं। इन आरोपों का सिलसिला काफी देर तक चलता रहा और आखिर मेरे सब्र का बांध टूटा और मैं बोल पड़ी कि हाँ ! मैं बुरी हूंँ पर आप अच्छे हो या भूल गए , क्या तुम्हें याद है कि तुम्हारी हवस की खातिर मैं कितनी बार तुम्हारे थप्पड़ का शिकार हुई हूँ और चेहरे पर लगे चोट को छुपाने के लिए अपने आँचल से चेहरा ढक कर निकला करती थी। आते हुए ये जानते हुए भी कि मेरे साथ क्या हुआ है लोग पूछते थे कि क्या हुआ है और मैं तुम्हारी बदसलूकी को छुपाते हुए कहती थी कुछ भी तो नहीं, कुछ भी तो नहीं ।
भूल गए क्या हर रात का डर जो तुम्हारे आते वक्त मुझे लगता था ये सोच कर कि आज नशे में ना जाने तुम कौन सा नया तमाशा करोगे ।
क्या तुम्हें याद है जिस बच्चे के नाम पर तुम मुझ पर बुरी माँ होने का आरोप लगा रहे हो इस बच्चे के जन्म पर अस्पताल में तुमने कितनी नौटंकी थी और तुम्हारी वजह से मुझे इतना अपमान सहना पड़ा था।
अरे छोड़ो ये भी क्या तुम्हें याद है मेरी पहली तीज जब मैं तुम्हारे लिए व्रत रखने वाली थी और उस रात भी मैं तुम्हारी नशे का शिकार हुई थी इतनी बुरी तरह से डरी हुई थी मैं कि तुम्हारी नजरों से छुपती फिरती थी तुम भूल चुके थे कि उस वक्त मुझ में एक साँसे पल रही थी और जब माँ ने पूछा मुझसे," तुम्हारा तीज का व्रत है तुमने क्या खाया है?" तो मैंने उनसे झूठ कह दिया कि मैंने पूरी खीर बनाया था। उस माँ को ये फिक्र थी कि मेरी बेटी तो दिन भर खाने को माँगती थी कल उसका निर्जल व्रत है कैसे वो रह पाएगी? ये खा लो वो खा लो कह रही थी पर उन्हें क्या पता कि उसकी बेटी आज सिर्फ मार खाकर ही सो गई थी । और तुम मुझ पर आरोप लगा रहे हो अभी मैं यह सब कह ही रही थी कि अचानक मेरी नज़र दरवाजे पर पड़ी जहाँ माँ खड़ी यह सब सुन रही थी। स्तब्ध थीं मुझे देखकर कि ये मेरी वह बेटी है जिसे एक डाँट पर रोना आ जाता था ,यह मेरी वो बेटी है जो छोटी सी खरोच पर चार बार मुझे दिखाती थी कि मम्मा देखो तो मुझे चोट लगी है उसने इतना कुछ बर्दाश्त कर लिया वह भी मुझसे बिना कुछ बताए ।
कैसे तुम मुस्कुराती थी और कैसे ये कह पाती थी मुझसे कि माँ मैं बहुत खुश हूँ ?
मेरे माथे को चूमा और बोली तुम हिम्मत नहीं हारना मैं हर कदम पर तुम्हारे साथ हूँ और तुम्हारी जिंदगी को लेकर जो भी फैसला होगा मैं हर फैसले में तुम्हारे साथ हूँ तुम फिकर ना करो इस जमाने की मैं तुम्हारे लिए इस दुनिया से भी लड़ जाऊँगी ।
लेकिन वह भी जानती थी कि यह समाज यह लोग एक औरत जिसका नाम अपने पति से अलग हो जाता है उसे लोग तुच्छ नज़र से देखने लगते हैं और अगर इस रिश्ते को तोड़ आगे बढ़ जाऊँ और अगर बांँध लूँ किसी और के साथ जिंदगी तो क्या वो मेरे साथ ऐसा नहीं करेगा यह सोचते हुए वापस लौटने का फैसला किया। लेकिन अब मैं वो लड़की नहीं थी जो पहले आई थी अब मै अपनी माँ की हिम्मत लेकर आई थी।
अब उसमें इतनी हिम्मत आ गई थी कि वह दुनिया की हर तूफान से लड़ने की हिम्मत रखती थी।
अपने आप से अब वो एक वादा करके आई थी, किसी को अपने ऊपर हाथ नहीं उठाने देगी और अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता नहीं करेगी और ना ही किसी को उसका अपमान करने देगी ।
ये हिम्मत ये हौसला उसे नए मोड़ पर ले आया नई जिंदगी को अलग मुकाम पर पहुंचाया।
मुस्कुराती है अब वो हरदम खुद भी और दूसरों को भी हँसाया करती है।दूसरों को भी हँसाया करती है।
लेकिन औरत का यूँ तमाशा बनते देख मुझे समझ आ गया था कि माँ हमेशा क्यों कहा करती थीं कि मुझे बेटी नहीं चाहिए, मुझे बेटी नहीं चाहिए।
"मैंने दर्द भी सहना सीख लिया,
तूफ़ान से लड़ना सीख लिया,
और तूफानों से लड़ते-लड़ते,
मैंने जीवन जीना सीख लिया।
मैंने जीवन जीना सीख लिया।"
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