क्यों बेपरवाह से रहने लगा है मन आजकल क्यों अजीब सी हलचल में खोने लगा है मन आजकल क्यों जिस्मो की हुढक लगी है ज़माने को क्यों भावनाओं का मोल नहीं यहां आजकल क्यों जिस्मानी मोहब्बत ही सच्ची होने लगी है क्यों रूहानी मोहब्बत का मोल नहीं आजकल क्यों छुपे होते है घात लगाए भेड़िये मुखौटे की आड़ में क्यों मिलती नहीं दोस्ती सुदामा कृष्ण सी आजकल क्यों तारों के आसमान तले सुकूँ का जहान नहीं मिलता क्यों जुगनूओं को देखकर रौनक़ का वो समां नहीं मिलता आजकल क्यों चाहतो से भरपूर हो कर भी तन्हाई का आलम मिलता है क्यों निःस्वार्थ होकर भी चालबाजो का कारवां मिल जाता है हर कदम आजकल क्यों मोहब्बत, दोस्ती की आड़ में जिस्म फरोख्त का उद्देश्य मिलता है... क्यों वी सीधी सच्ची मोहब्बत, दोस्ती का इंसा नहीं मिलता आजकल.....