पिछला भाग:--
हम लोग जल्दी जल्दी चलते हुये टेंट में पहुँचे....
बहुत भीग भी गये थे...जल्दी जल्दी सामान 
समेटा बस में रखा... फिर निकल लिए....सर 
बोले दो घंटे का तो रास्ता है...घर पहुँच ही जायेंगे.....
अब आगे:--
बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही....उमड़ घुमड़ 
के बदरा छाए.... फिर भी एकमत से हम सभी 
निकल पड़े अपने गंतव्य की ओर.....
बारिश का जोर थमने को नहीं आ रहा....
गाँव के छौर के पहले सेही पानी पानी दिख रहा....
रास्ता तो समझ ही नहीं आ रहा....
अब क्या करा जाये ओर कोई दूसरा रास्ता भी तो
नहीं है!! 

हम सब बैठे बैठे सोच ही रहे थे...देखा एक महोदय
दौड़ते चले आ रहे हैं... दोनों दोनों हाथों को हिलाते
हुये कुछ कहते भी जा रहे हैं...हम लोगों को कुछ
समझ तो आ नहीं रहा था....
जब वो पास में आ गए... उन्होंने हमें आगे जाने से 
मना करा....और लौट चलने को कहा...
वो बोले आंगे ने बढ़ियो...लौटा लेऔ गाड़ी....
अब्बयीं के पूर आयी जयी है...घरे चलो आप औरें
काकी बुलवायीं हैं.......

अब क्या करते सो सर और मैडम लोगों की गुफ्तगू 
हुयी... निर्णय लिया गया वापस लौटने का.....
इसके अलावा कोई चारा भी न था... पानी जब तक 
रुक न जाये...सो हम सब पहुँचे कमला काकी के घर...काकी ने तो सबको हिदायत दे डाली.....
पहले आप सभी अपने अपने कपड़े बदल लें.....
आप सब गीले हैं...ठंडी बैठ जायेगी.....
हम लोग बिना कुछ बोले.....अपना अपना सामान 
निकाले और कपड़े बदल लिए......

कमला काकी ने अंदर के बड़े कमरा में..... 
नीचे दरी बिछा कर बैठने की व्यवस्था करी थी.....
सो हम सभी वहाँ बैठ गये.....काकी बोलीं अब
आज रात तो आपको इधर ही बिताना पड़ेगी....
कल शाम तक तो पानी नहीं उतरने वाला....
यहाँ ऐसा ही पूर आता है...घबराने की कोई बात 
नहीं है...सब व्यवस्था हो जायेगी.....

रात के खाने में आज खिचड़ी अचार और पापड़
है... हओ मठा सोयी है...सो सब जनें खाओ और
सोओ...गद्दा जरुर डाल दे हैं मनो नीचेयी सोने पड़ है....भुंसारे दैखवी का हौत आये....
अब आज तो रुकने ही पड़ है...बाजू वाले घर में 
भी व्यवस्था कर दी है.....

पानी तो इतना बरस रहा जैसे इन्द्र देवता ने....
हम लोगों को इस गाँव में... रोकने का ठेका ले 
लिया हो....अब काहे को नींद आने चली....
घर की चिंता लगी सभी को...घर में सब परेशान 
हो रहे होंगे....उस समय मोबाइल तो थे नहीं जो
जरा में हरखबर पहुँच जाती.....

आँखों ही आँखों में रात कटी... सुबह-सुबह सोचा
देखकर आऊं...क्या स्थिति है!!
पर गजब!! काकी को तो पहले से ही पता था....
बोलीं बेटा कोई दिक्कत नहीं है आराम से रहो...
जहाँ लौं संजा होत होत पानी उतर जयी है.....
पवन बोला- काकी बात असल में ये है घर में सब
चिंता कर रहे होंगे...!!
हाँ बेटा बे तो कर हयीं चिंता...मनो अपन कछु कर
नौंयी सकत खैर जै लो चाय पी लो.....
तुम औरें सोयी मुँह हाथ धोओ...चाय बन गयी
आये सो चाय पियो.......

हमने सोची कुछ पता ही नहीं चला...काकी कब
उठ गयीं नित्य कर्म से निवृत्त भी हो गयीं...और 
खबर भी है उन्हें... पानी अभी उतरा नहीं है....
हम सब भी एक एक करके जैसे-तैसे नित्य कर्म
से निवृत हुए...काकी ने तो आज नाश्ते में गर्मागरम 
पकोड़े बना कर खिलाए.......

फिर हम लोग काकी से बात करते रहे....
काकी का जीवन कैसे संघर्षों में बीता....गाँव 
में कुल जमा तीस पैंतीस घर हैं....कक्का मुखिया
जी रहे नहीं...काकी के संतान भी नहीं है.....
पहले पहल सब दया भाव रखते थे.....
फिर काकी ने गाँव में बहुत कुछ सुविधाएं जुटायीं...
गाँव को ही अपना घर मान लिया.....
गाँव में सभी लोग... खेती किसानी पर ही आश्रित थे...किसी को कुछ भी जरुरत होय सो पास के 
गाँव में जाना पड़ता लेने.....

काकी ने थोड़ी मदद करके गाँव में ही छोटी मोटी 
रोजमर्रा की ज़रूरतों के सामान की दुकान खुलवा दीं....कपड़ा लत्ता, बर्तन भाड़े, परचून
किराना की...जिसको भी कोई तकलीफ़ हो सो
काकी मदद के लिए तुरंत पहुँच जातीं.....
गाँव वाले काकी को बहुत मानने लगे....
उनका बहुत मान सम्मान करने लगे...
कमला काकी की बात कोई नहीं काटता....
सो गाँव में इतनी अच्छी व्यवस्था बनी हुयी है....

हमने देखा दो चार औरतें कुछ कुछ सामान लिए 
कमला काकी की रसोई में चली गयीं.....
वहाँ पै खाना बनना शुरु हो गया था.....
बड़ी अच्छी महक भी आ रही थी....
काकी भी अंदर चली गयीं थीं....

मैडम, हेमलता, कृष्णा इन सभी ने खाना बनाने 
में मदद करने की सोची... पर काकी ने मना कर
दिया तुम औरें मेहमान हो हमायी.....
हम लोगों ने सोचा कितना सेवा भाव है इन लोगों 
में....गजब की मेहनत करती हैं ये सब शहर में कहाँ
कोई इतनी मेहनत कर पाता है....न ही इतना सेवा 
भाव और न ही इतनी दरियादिली......

आओ बिन्नी हरें तुम औरों को काम बताएं.....
सो थाली कटोरी पकड़ा दीं,आज खाना परोसो
तुम लोग...चमाचम चमकती थालियों में आज
तो दाल बाटी लड्डू और साथ में मठा.....
दोपहर के दो बज गये थे भूख भी लग आयी थी....
सो छक कर भोजन करे.... वा वाह मजा ही आ गया...बहुत स्वादिष्ट जो बना था खाना.....

फिर सब महिलाओं ने भोजन करा......
अब क्या करें...?सवाल था बाहर जा नहीं सकते!!
थोड़ा टहल ही आते.... पर बारिश तो अभी भी रिमझिम रिमझिम हो रही है.....
सो लड़कियों ने सलाह दी... अंताक्षरी खेलेंगे....
लड़कों की टोली अलग और हमारी अलग देखते
हैं कौन जीतता है......

चलो भई शुरु करो अंताक्षरी लेकर प्रभु का नाम...
म अक्षर से बोलो...कविश बोला--
मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने,
सपने सुरीले सपने....
न पर बोलो--
नयना तेरे रंग भरे सपने तो सजाने लगे.....
ग पर बोलो--अब तुम नहीं बोलोगे!! सब बारी
बारी से बोलेंगे... सबको मौका मिलना चाहिए....
बोलो सुमित तुम बोलो.....
गीत गाता हूँ मैं गुनगुनाता हूँ मैं, हँसने का वादा
किया था कभी, इसलिए अब सदा मुस्कुराताहूँ मैं...
म अक्षर पर फिर से आ गया अब तू सुना साक्षी...
मेघा छाए आधी रात बैरन बन गयी निंदिया....
य अक्षर पर बोलो तुम लोग.....

अंताक्षरी चल ही रही थी कि एक बच्चा आया दौड़ा दौड़ा...काकीऽ काकीऽऽ पानी उतर रहा है....
चलो चलो तुम औरें जल्दी से अपनो अपनो समान धर लेओ.....जैसेयी पानी उतर है तुम औरें औ पार
हो जईयो......
बस में बैठे हम सोच रहे धन्य है ये गाँव....
यहाँ के लोग हमें बहुत कुछ सीखने मिला.....
देखा हमने कैसे हिलमिल कर रहना....
धन्य है आदर सत्कार...मान सम्मान......
सही कहा है भारत तो गाँवों में बसता है......
धन्य है कमला काकी.....
प्रत्यक्ष देखा हमने....

  🌹"अतिथि देवो भव"🌹
       🙏🙏🙏🙏🙏

  कहानीकार-रजनी कटारे
       जबलपुर ( म.प्र.)

नोट:--
समाप्त कहानी