शक्ति जीवन का आधार
बिन शक्ति निष्क्रिय संसार।
जाने क्यूं भान मुझे यह होता है,
जब अप्रत्याशित कुछ घटित हो जाता है,
मन विस्मित और किंकर्तव्ययविमूढ रह जाता है,
भीड़ के बीच आंख सूनी हो जाती हैं;
ह्रदय का रुदन सिर्फ सुनायी हमें ही देती है।
जाने कब....कैसे...
भीतर से शक्ति प्रकट हो जाती है।
जैसे नदी की धार अवरूद्ध हो जाए अगर,
नई राह वो खोज लेती है,
भीतर जो बह रहा निरंतर,
उसके प्रवाह को रोक कहां फिर पाती है?
जैसे मां शताक्षीके एक नयन मूंदते दूसरी खुल जाती है।
भीतर से शक्ति नये रूप में प्रकट हो जाती है!
शक्ति ही जीवन का आधार ,
बिन शक्ति सूना संसार;
चलता रहे यह जीवन-चक्
प्रकृति कहीं से फिर हमें जीवन का गूढ रहस्य समझाती है,
शक्ति के भी हैं कई द्वार
एक बंद हो जाए अगर,
दूसरी खुल जाती है।
स्वंय नियंता भी शक्ति का आह्वान कर सृष्टि की रचना करते हैं,
क्षय होते ही शक्ति सृष्टि को अपने अंतः में समेट लेते हैं।
शक्ति जीवन का आधार
बिन शक्ति सूना संसार।
✍डाॅ पल्लवी कुमारी"पाम "

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