बारिश की ये नहीं बून्दें थीं
सजी थीं ओस कणिकाएं
कोमल दूब की नोकों पर 
वृक्षों की नुकीली कोंपलों पर 
बिछी हो जैसे मोतियों की चादर
सज गई प्रकृति ओढ़े ठंडी चादर
ये बारिश नहीं ओस की बून्दें थीं 

बारिश सौंप गई थी 
ओस को कुछ कार्यभार
कर ले  तू भी प्रकृति की
थोड़ी सी साज सम्भाल
कुम्हलाये न कोई दूब कोई फूल
पड़ने न पाये उन पर  धूल
रोज आना उन्हें धीरे से सहला जाना
 कुम्हलाने न पायें वे कभी
उन्हें तेज  धूप से रोज बचाना


रेनु सिंह