साथियों, हर मनुष्य की अपनी एक जीवनगाथा होती है। जिसमें ईश्वर प्रतिदिन एक नई इबारत लिखता है। वो उस मे खुशियों के रंगीन चित्र वाले चिकने पन्ने भी जोड़ता है और दुख के खुरदुरे स्याह पन्ने भी। जीवन सुख और दुख दोनों का मिला जुला स्वरूप है। मानव का स्वभाव कभी कभी ऐसा दिखाई देता है जैसे नमक चीनी का मिश्रण। दोनों देखने में एक समान होते हैं। लेकिन उसके स्वाद में जमीन आसमान का अंतर होता है। ऐसे ही कई मनुष्य ऐसे होते हैं जो देखने में तो चीनी की तरह मीठे लगते हैं लेकिन जब उनके साथ वक्त बिताया जाता है तो उनकी हकीकत सामने आ जाती है असल में वो नमक के समान कड़वे ही होते हैं । बस उन्होंने अपने ऊपर एक खोल चढ़ाया होता है जिस पर चीनी का लेबल लगा होता है।
और कभी कभी ऐसा भी होता है कि किसी व्यक्ति को हम नमक समझते हैं उससे नाक भौं सिकोड़ते है लेकिन वो हमारे जीवन में मिठास घोलने का काम करते हैं। 

अभी तक आपने पढ़ा कि सृजन को सिस्टर मारिया एक डायरी देती हैं जिसे सृजन को कहीं पहुंचाना था। सृजन उस व्यक्ति को ढूंढने में जी जान लगा देती है।

इधर सिस्टर मारिया उसकी याद में खो जाती हैं जिसने यह डायरी लिखी है । उनको ऐसा महसूस होता है मानो वो उन्हें धन्यवाद कह रही है। उन्हें याद आया जब वो ऐसी ही कड़कड़ाती ठंड में बिना किसी गर्म कपड़े के एक छोटा सा बैग हाथ में लेकर उनके आश्रम में आई थी। उसे देखकर आश्रम का सिक्योरिटी गार्ड हैरान रह गया। उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो उसके लिए यह ठंड का मौसम नहीं बल्कि मई जून की भयंकर गर्मी का मौसम है। 
बेपरवाही से वो अपना बैग थामे खड़ी थी। हल्के नीले रंग की सूती साड़ी जिसके ऊपर सफेद कलर से हल्के हल्के से छोटे छोटे प्रिंट्स बने हुए थे, और सफेद कॉलर वाला ब्लाउज पहने हुए धान पान सी 24- 25 साल की वह लड़की  सिक्योरिटी गार्ड से अंदर आने की इजाजत मांग रही थी। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। ऐसा लग रहा था मानो वह कोई स्वचालित रोबोट हो। लेकिन अगर कोई उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करे तो उसे महसूस होगा कि उसमें ना जाने कितने भाव छिपे हैं जिसे हर कोई नहीं समझ सकता।  , सूनी आंखें, लंबे कालेबाल ,जिसकी आवारा लट उसके चेहरे को बार बार चूम रही थी। लेकिन वो इन सबसे बेखबर थी। उसकी उम्र भले ही 24-25 
हो लेकिन वो 18 -19 साल से अधिक नहीं लगती थी।  वो दुबली पतली सी लड़की जिसके होंठ इतने सुंदर थे मानो कमल की पंखुड़ी हों। उसका रंग दूधिया सफेद था  मानो दूध में केसर मिला दिया गया हो। लेकिन उसके चेहरे से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो इसके अंदर एक दर्द का अथाह समंदर हिलोरे मार रहा है। उसका चेहरा ऐसा था जैसे जमी हुई झील के नीचे पानी होता है। बाहर से शांत दिखने वाला अपने अंदर बहुत कुछ छिपाए हुए था।  उस सुंदर शरीर की मलिका का अंतर्मन अत्यधिक पीड़ा से भरा हुआ था। ऐसा उसके चेहरे से साफ साफ परिलक्षित हो रहा था। चेहरे पर जख्मों के निशान उस पर हुए जुल्म की दास्तान सुना रहे थे। भले ही उसने अपने होंठों को सी रखा हो लेकिन अपने जख्मों को सिलना भूल गई थी। सिक्योरिटी गार्ड को जब उसने दुबारा पुकारा तो उसने सिर झटका और कहा-

मेमसाब, अभी मां आराम कर रही हैं अगर आप बाद में आएं तो ? असल में वो अभी अभी अपने रूम में गई हैं , थक गई होंगी, वो  सारा सारा दिन काम करती रहती हैं इसलिए मैने ऐसा बोला। आई होप, आप बुरा नहीं मानेगी। सिक्योरिटी गार्ड ने उसे समझाने की कोशिश की। 

वास्तव में वो सिक्योरिटी गार्ड बहुत छोटा सा था तब उसे सिस्टर मारिया एक कूड़ेदान से उठाकर लाई थी । उसे वहां कौन फेंक गया था? उसकी क्या मजबूरी थी ? ये सब  उसे कभी पता नहीं चला। उसके लिए सिस्टर मारिया ही उसकी मां थी । अगर वो उसे अपने सीने से नहीं लगाती तो उसका नामों निशान कहीं ना मिलता। कुत्ते उसे नोचकर खा गए होते। लेकिन वो आज जिंदा है । और आश्रम की रखवाली कर रहा है । सिस्टर ने तो उसे पढ़ाने लिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उससे नौकरी करने के लिए  कहा। साथ ही ये भी कहा कि अब वो इस आश्रम को छोड़कर बाहर जा सकता है ।वो  इस लायक हो गया है कि आराम से बाहर जाकर नौकरी कर सकता है। 
लेकिन उसने उनकी बात नहीं मानी। उसने उनसे कहा कि

ये जिंदगी आपने दी है मां , बाहर के समाज ने मुझे ठुकरा दिया था, अगर उसे मेरी जरूरत होती तो मुझे कूड़ा समझ कर कूड़ेदान में नहीं फेंका जाता। मैं तो दुनिया के लिए अब कूड़ा ही हो गया हूं ना। इसलिए मैं उनके पास नहीं जाऊंगा, अब मैं इसी आश्रम की रखवाली करूंगा। आपकी सेवा करूंगा। बस मैं इतना चाहता हूं कि आप मुझे कभी खुद से अलग ना करें। मैं आपके बिना कहीं नहीं जा सकता। आपके पैरों में ही मेरी सारी दुनिया है। इतना कहकर वो उनके पैरों में गिर कर रोने लगा।

सिस्टर मारिया ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया। उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा कि अब इस आश्रम की जिम्मेदारी तुम्हारी है। तुम जैसे चाहो जिस रूप में चाहो उस रूप में इस आश्रम की देख भाल कर सकते हो। तब मोहन ने उस आश्रम का सिक्योरिटी गार्ड बनना चाहा। और बिना किसी स्वार्थ के वो अपना कर्तव्य निभाता चला आ रहा है।

मोहन की बात सुनकर उन लड़की ने एक नजर उसकी ओर देखा । ओह! वो निगाहें कैसे भुलाई जा सकती थी? कितना खालीपन था उन आंखों में? जैसे उसका  जीवन रिक्त हो गया हो। कुछ भी ना बचा हो अब। फिर से धीरे से कहा -

कोई बात नहीं, आप उन्हें आराम करने दीजिए , हम फिर कभी आ जायेंगे।  इतना कहकर उसने अपना बैग उठाया और धीरे धीरे  वो आश्रम से सड़क की ओर जाने लगी। मोहन का मन हुआ कि वो उसे पीछे से आवाज देकर रोक ले, उसे न जाने दे। लेकिन उसे सिस्टर मारिया के आराम की चिंता थी इसलिए वो थोड़ा स्वार्थी हो गया था।
रुकिए ... तभी पीछे से आवाज आई। और उसके कदम वही ठहर गए। मोहन ने पीछे मुड़कर देखा तो....

क्रमशः
संगीता शर्मा "प्रिया"