गुरुजी का दिमाग पूरी तरह से चकरा गया है,वो अपनी सोचने समझने की सारी शक्ति खो चुके हैं!अब वो उस शीशे को चाह कर भी नष्ट नही कर सकते।अब वो पीहू से पूछते है कि तुम इस शीशे में कैसे कैद हुई?

पीहू गुरुजी से कहती है,छाया ने अपने मंत्रों की शक्ति से मेरी आत्मा को इस शीशे में कैद कर दिया है और स्वयं मेरे ही शरीर मे कब्जा कर लिया है।उसे पता था कि आप सभी मुझे बचाने के लिए यहाँ जरूर आओगे,इसीलिए उसने पहले ही मेरे शरीर पर कब्जा कर लिया और अपनी शक्ति से मेरे चेहरे को इतना भयंकर बना दिया कि कोई भी पहचान न पाए।अब अगर किसी ने भी छाया को मारना चाहा तो मेरा शरीर भी साथ ही नष्ट हो जाएगा और मैं हमेशा के लिए इसी शीशे में कैद रह जाऊँगी।


गुरुजी उसे तसल्ली देते हैं और कहते हैं कि तुम  चिंता मत करो बेटी मैं कुछ भी ऐसा नही होने दूँगा!ये कहकर वो वापिस जाते हैं स्वामी केशवदास को रोकने कि कहीं वो पीहू के शरीर को नष्ट न करदे।

दूसरी तरफ,अब केशवदास जी बेहोश हो जाते हैं और छाया उनकी तरफ बढ़ रही है।उनका एक शिष्य ये सब देखता है तो छाया के पहुँचने से पहले ही वो अपने झोले में से वभूती निकाल लेता है और छाया के ऊपर गिरा देता है।छाया उस वभूती से तड़पने लगती है और कुछ समय के लिए वहाँ से पीछे हट जाती है।अब वो शिष्य केशवदास को थोड़ा गंगाजल पिलाता है जिससे उन्हें होश आ जाता है।जबतक वहां पर गुरुजी भी आ जाते हैं जो पीहू के शीशे में कैद होने की सच्चाई उन्हें बताते हैं।

केशवदास भी ये बात सुनकर चकरा जाते हैं और अब ये सोच रहे हैं कि किस तरह से पीहू की आत्मा को उस शीशे से आजाद किया जाए?

अब वो सब मिलकर खड़े होते है और एक साथ फिर से मंत्रों का उच्चारण शुरू कर देते हैं जिससे अब छाया तड़पने लगती है।अब वो तड़पते-तडपते वहीं जमीन पर बैठ जाती है।तभी वो सभी उसकी घेराबंदी कर लेते हैं और उसके आस पास एक शक्तिशाली शिव वभूती से चक्र बना देते हैं।अब छाया चाह कर भी उस चक्र में से बाहर नही आ पाती है।अब वो मंत्रों का उच्चारण तेज कर देते हैं।

नीरज ये सब देख रहा है और वो अब चुपचाप जाता है!कौशल्या उसे चुप चाप वहां से जाती हुई देख रही है तो वो भी उसी के पीछे चल देती है।नीरज उसी कमरे में चला जाता है जहाँ पर वो चमत्कारी शीशा है।अब वो उस शीशे को आग के हवाले करने लगता है तो बीच मे कौशल्या आ जाती है क्योंकि वो पहले ही गुरुजी की कही बातों से ये जान चुकी थी कि इसी शीशे में अब पीहू की आत्मा कैद है!इसीलिए वो अब उस शीशे को नष्ट करना चाहता है।लेकिन इससे पहले के नीरज ऐसा कर पाता कौशल्या वहाँ आकर उसे एक थप्पड़ मारती है और दूर धकेल देती है।नीरज फिर से उठता है और  कहता है माँ आप बीच मे मत आइये!चले जाइये यहाँ से आप।

लेकिन कौशल्या अब बिना उसकी कोई बात सुने ही उसे तक ओर थप्पड़ मारती है।नीरज को भी अब बर्दाशत नही होता है और वो अपनी ही माँ पर हाथ उठा देता है लेकिन तभी वहाँ गुरुजी की भेजे हुए उनके दो शिष्य आ जाते हैं और नीरज को दूर धक्का देते हैं।अब वो उस शीशे को उठाकर बाहर वहीं ले जाते हैं जहाँ पर गुरुजी और उनके भी गुरुजी केशवदास मंत्रों का उच्चारण कर रहे हैं।अब वो शीशा ठीक छाया के सामने रख देते हैं।अब स्वामी केशवदास जी कहते हैं दुष्ट चुड़ैल छोड़ इस बच्ची का शरीर,नही तो तू यहीं तड़पती रहेगी।

छाया भी साफ मना कर देती है लेकिन जब उससे तड़प बर्दाश्त नही होती तो वो पीहू के शरीर मे निकल जाती है और उसके निकलते ही पीहू की आत्मा भी उस शीशे में से निकल कर वापिस उसके शरीर मे चली जाती है।सभी का ध्यान पीहू की ओर चला जाता है और कौशल्या आकर उसे उठाती है और गले लगा लेती है।अब कौशल्या पीहू को हिम्मत देती है और कहती है रो मत मेरी बच्ची,अब हम आ गए हैं ना तो सब ठीक हो जाएगा।गुरुजी सब ठीक कर देंगे।


पीहू भी कब कौशल्या के गले लग कर बहुत ज्यादा भावुक हो जाती ह।सभी का ध्यान पीहू में होने की वजह से छाया को भी अब मौका मिल जाता है अपनी शक्तियों के प्रयोग में लाने का।वो जादू से तेज हवा चला देती है जिससे उसके चारों ओर बना हुआ वभूती का चक्र हवा में उड़ जाता है।अब छाया वहां से निकल कर गायब हो जाती है।

अब वो फिर से अपना प्रकोप शुरू कर देती है और जोर-जोर से हँसने लगती है।उसके जादू से तेज हवाएं चलने लगती है और तूफान आ जाता है।बिजली भी चमक रही है और अचानक ही मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है।मौसम बहुत ही भयानक हो चुका है और तभी छाया कहती है मैं एक शक्तिशाली चुडैल हूँ और मुझे पकड़ना तुम जैसों के बस की बात नही है।

अब केशवदास भी मन्त्र पढ़ते हुए उसके करीब आते हैं और उसपर अभिमंत्रित वभूती छिड़क देते हैं।अब छाया उस वभूती से तड़पने लगती है और उसकी शक्तियाँ भी नष्ट होती जा रही है।लेकिन फिर भी उस चुड़ैल ने हार नही मानी है और वो केशवदास को गर्दन से पकड़ने की कोशिश करती है।इससे पहले के वो उनकी गर्दन तक पहुँच पाती उससे पहले ही वो उसे उसके बालों से पकड़ लेते हैं और उसे घुमाकर दूर जमीन पर फैंक देते है।


छाया की दुर्दशा नीरज से देखी नही जाती है इसीलिए वो दौड़ता हुआ आता है और गुरुजी को धक्का मारकर दूर गिरा देता है।अब वो गुस्से में स्वामी केशवदास की ओर बढ़ता है लेकिन उससे पहले ही उनके शिष्य उसे पकड़ कर दूर फैंक देते हैं।

अब केशवदास फिर से छाया की ओर बढ़ते है और उसे उसके बालों से पकड़ लेते हैं।अब वो उसे कहते हैं दुष्ट आत्मा,बता मुझे तेरा ये बेटा कैसे मरेगा?

लेकिन छाया कुछ नही बताती और जोर-जोर  हँसने लगती है।वो कहती है वो मेरा बेटा है तू उसे चाहे तब भी नही मार सकता है!ये कहकर वो जोर-जोर से हँसने लगती है।
छाया जोर-जोर से हँसने लगती है और कहती है कि मेरे बेटे का अंत कोई नही कर सकता है।


ॐ नमः शिवाय
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