आंध्र प्रदेश के पश्चिम भाग में कुर्नूल जिले के नल्लामल्ला जंगल के मध्य श्री शैलम पहाड़ी पर स्थित भ्रमरंभा मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग है।
यह शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से दूसरा है।
इसके बारे में कहा जाता है कि यहां शिव शक्ति दोनों ही विराजमान हैं।कहते हैं यहां के दर्शन से मनुष्य आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है।
यह शैव और शाक्त दोनों का तीर्थ है।  आदिशंकराचार्य ने अपनी रचना शिवलहरी भी यहीं रचित की थी।
शिव पुराण के अनुसार कार्तिकेय अपने माता-पिता से नाराज हो दक्षिण भारत चले आए और श्री शैलम पर्वत पर  
निवास करने लगे उन्हें मनाने के लिए शिव पार्वती ने  भील भीलनी क्रमशः अर्जुन और मल्लिका का रूप  धारण किया। और मना कर कार्तिकेय को कैलाश ले गए। 

भगवान शिव  यही पर्वत पर ज्योति रूप में विराजमान हो गए कहते हैं अमावस्या की  शिवरात्रि की रात शिव  और देवी पार्वती पूर्णिमा को दर्शन देती हैं ।

हैदराबाद से श्री शैलम की दूरी  216 km है,यहां सड़क मार्ग से बस ,और टैक्सी की सुविधा उपलब्ध है।।

पहाड़ों जंगलों के मनोरम दृश्यों को देखते आप वहां जा सकते हैं ,। मल्लिकार्जुन जाने के रास्ते में  सबसे पहले साक्षी गणपति का मंदिर मिलता है,  यहां गणेश जी की काले रंग की प्रतिमा विराजमान है।

 मान्यता है कि साक्षी गणपति आने वाले हर तीर्थ यात्रियों के लेखा जोखा रखते हैं यहां मंदिर में गणपति के दर्शन  का समय सुबह 6:00 बजे रात्रि 9:00 बजे तक है।

यह मंदिर  श्रीशैलम मंदिर और श्रीशैलम डैम के बीच स्थित है

 आगे चल अमराबाद टाइगर रिजर्व मिलता है घने  जंगल के बीच में कुछ बस्तियां हैं।
जंगल से ही श्रीशैलम   जाने का रास्ता  है ।

यहां इस टाइगर रिजर्व में  9 बजे के बाद प्रवेश वर्जित है।

आगे जाने पर चौराहे पर  एक बड़ी सी शिवलिंग और नंदी की मूर्ति स्थापित है।

कृष्णा नदी पर एक रोपवे भी है जो श्रद्धालुओं को उपर मंदिर तक ले जाता है।

मंदिर परिसर के ठीक सामने चप्पल बैग मोबाइल रखने का स्थान है उसके आगे ही टिकट काउंटर  पर टिकट मिलता है।

 वीआईपी  दर्शन के लिए भूल भुलैया जैसे एक रास्ते से जाना होता है। 
और आप फ्री में भी दर्शन  कर सकते हैं। 

एक कतार में आकर फ्री वाले और पैसे वाले दोनों एक लाइन में हो जाते हैं

 मंदिर के हॉल को मंडपम कहते हैं,  इस मंडपम को  विजयनगर राज्य के राजा हरिहर के द्वारा निर्माण किया गया है ।

मंदिर पूर्व मुखी है मध्य मंडपम में बहुत  सारे खंभे हैं यहां एक प्रतिमा विराजमान है ,मुख्य मंदिर में पहुंचने पर सबसे पहले नटराज की मूर्ति दिखाई देती है ,गर्भ गृह  काफी छोटा है  दूर से द्वितीय ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन  के दर्शन होते हैं।

दर्शन करने के बाद ही यात्रा की सारी थकान मिट जाती है ,एक असीम शांति महसूस होती है।

 यहां का स्थापत्य काफी सुंदर और सुरुचिपूर्ण है ।यहां पांडवों द्वारा स्थापित सहस्त्रलिंग मौजूद है ।यहीं महर्षि  अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा की मूर्ति स्थापित है। 

 प्रांगण में ही  ब्रह्मरंभा  मंदिर भी है यहां मां की मूर्ति की  छटा ही निराली  है जिसे देखकर रोम-रोम आनंदित हो जाता है।
तीर्थ दर्शन से आत्मा का उत्थान होता है,सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।