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दिन गुज़रती है घर के ज़िम्मेदारीयों में
ज़िन्दगी में हर रात भयानक होता है
जानकर भी अनजान बने रहते है क्यूँ कुछ नहीं बोलते
ज़ब घर में किसी के बेटी को सताया जाता है

घर में उनकी भी अपनी बेटी होती है
पर किसी और के बच्ची को तकलीफ देने से नहीं चूकते
ज़रा भी दया नहीं आता है उस मासूम पर
ज़ब घर में किसी के बेटी को पिटा जाता है

ज़ब जरूरत होता है बोलना वहाँ खामोश रहते है
किसीके पीड़ा नहीं समझते खड़े तमाशा देखते है
उठाया जो बहू आवाज़ तो तड़प पड़े उसपे सारे
ज़बकी एक लड़की की आत्मसम्मान की बात होता है

नाही कोई वजह रह जाता ज़िन्दगी में कोई
जब समझता नहीं एक बेटी तकलीफ को जहाँ में कोई
आँख तो तब खुलती है ज़ालिमो के ज़िन्दगी में
ज़ब उनके खुदकी बेटी को कोई जिन्दा जलाया जाता है

क्यूँ करते है बेटी और बहू में भेदभाव दुनिया
उनकी भी तो ख्वाब होंगी मिले अपनों से खुशियाँ
इनके दिल में जख्म देना बहुत आसान होता है
पर निंशा नहीं मिटता इंसान की उम्र निकल जाता है.....!!
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नैना.... ✍️✍️