समय एकदम बदल गया। एक कायर एक वीर बन गया। गुलाम रियायत में देशप्रेम की अलख जग गयी। साथ ही साथ ज्योति के मन ने भी राजा सौदान सिंह को स्वीकार कर लिया। एक खास उद्देश्य की प्राप्ति के लिये आरंभ किया गया प्रेम का नाटक यथार्थ में बदल गया।

    राजा सौदान सिंह को अभी तक पूर्ण सत्य पता नहीं था। वह यह तो समझ रहे थे कि ज्योति देशभक्ति में डूबे किसी प्रतिष्ठित परिवार की बेटी है। पर ज्योति खुद एक राजकुमारी है, यह सत्य उन्हें आज पता चला।

    राजमहल में राजा सौदान सिंह व सहाबर की राजकुमारी ज्योति के विवाह की तैयारियां आरंभ हो गयीं। सहावर के राजा विक्रम सिंह को भी दूत भेजकर ज्योति की सकुशलता से परिचित कराया गया। जो पिता अपनी पुत्री को मृत समझ रहा था, आज उसके पास बेटी के न केवल जीवित होने की सूचना थी अपितु बेटी के विवाह की सूचना भी थी। खुशी खुशी वह अपनी बेटी का कन्यादान करने अपने खास सैनिकों को साथ लेकर चल दिये।

   राजा सौदान सिंह के दूसरे विवाह के अवसर पर उनके अनेकों मित्र व संबंधी राजा उपस्थित थे। पहली पत्नी चित्रा के भाई भी बाहनपुर आ चुके थे। एक अलग सत्य यह भी था कि इन राजाओं ने ज्यादातर ने अंग्रेजी सेना को अपनी रियासतों की सीमा से खदेड़ दिया था।

   भारत माता को आजाद कराने के लिये अंग्रेजी सेना से लोहा लेने बाले ज्यादातर राजा गलतफहमी का शिकार थे। देश के विभिन्न हिस्सों में क्या हो रहा है, इसकी उन्हें पूरी जानकारी नहीं थी। वैसे भी ये सब छोटी रियासतें थीं। सच कहो तो इन राजाओं को बड़ा जमींदार कहना ज्यादा ठीक रहेगा। आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व अर्पण करने बाले बड़े राजा खुद संकट की स्थिति में थे। तो इन छोटी रियासतों को कौन सत्य बता पाता। संचार साधनों के अभाव में लापरवाही हो रही थी।

   काश कि देश की हर रियायत का राजा देशभक्त होता। काश कि सभी रियासतों द्वारा अंग्रेजी सेना को अपनी रियायत से खदेड़ देने की योजना कामयाब हो जाती। फिर कहीं भी आसरा न मिलने पर अंग्रेजों को उसी समय भारत छोड़ देना पड़ता।

   पर ऐसा हुआ नहीं। जिस समय राजा सौदान सिंह व ज्योति यह अनुमान कर रहे थे कि अभी तक तो अंग्रेज भारत छोड़ चुके हैं, उसी समय भारत देश के गद्दार राजाओं की मदद से अंग्रेजी अफसर भारतीय राजाओं के विद्रोह का लगभग पूर्ण दमन कर चुके थे। अनेकों आजादी के दीवाने राजा व रानियाँ रणभूमि में शहीद हो चुके थे। दिल्ली फिर से अंग्रेजों के कब्जे में आ गयी थी। मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को अंग्रेजों ने कैद कर रंगून भेज दिया था। इतना सब कुछ हो चुका था पर अनेकों छोटे राजाओं को कोई भी जानकारी न थी। देश को आजाद मानकर उनकी रियायत में राग रंग मनाये जा रहे थे।

   सही योजना का अभाव कहें या एकजुटता का अभाव, भारत की आजादी का पहला संग्राम लगभग असफल हो चुका था। उधर ऐसी स्थिति में बाहनपुर में राजा सौदान सिंह व राजकुमारी ज्योति के विवाह का आयोजन हो रहा था। इसी बाहनपुर की अंग्रेजी छावनी में राजा सौदान सिंह ने आश्रय लेने बाले अनेकों अंग्रेजी अफसरों को मार डाला था। कालचक्र ऐसा गुजरा कि आज वही स्थिति फिर से दुहराने बाली है। आजादी की लड़ाई में बढ चढकर हिस्सा लेने बाले अनेकों राजा अपने बहुत कम सैनिकों के साथ बाहनपुर में इकट्ठे थे।

   जिस दिन राजा सौदान सिंह राजकुमारी ज्योति के साथ परिणय सूत्र में बंधने जा रहे थे, जिस दिन राजा विक्रम सिंह कन्यादान का पुण्य अर्जित करने बाले थे, उसी दिन बाहनपुर को अंग्रेजी सेना ने चारों तरफ से घेर लिया। वैसे मुट्ठी भर अंग्रेजी अफसरों की सेना को अंग्रेजी सेना कहना ही गलत होगा। सही वाक्य है कि बाहनपुर को  से गुलामी की मानसिकता बाले भारतीयों की सेना ने चारों तरफ से घेर लिया।

     गद्दारों की बड़ी भारी सेना के समक्ष बाहनपुर की व समारोह में उपस्थित राजाओं की छोटी सी सेना की हार निश्चित ही थी। एक उपाय संधि प्रस्ताव भेजकर शांति वार्ता कर लेना था। पर ऐसा न कर आजादी के दीवाने मात्रभूमि के लिये अपने प्राण अर्पित करने चल दिये। विवाह के लिये दूल्हन के वेश में तैयार हुई ज्योति भी जल्द अपने परिधान बदलकर सैनिक के वेश में अपने मंगेतर राजा सौदान सिंह के साथ रणभूमि में निकल ली।

  इस युद्ध का परिणाम वही हुआ जो होना था। देश के लिये प्राण अर्पित करने की चाह रखने बाला हर वीर पचासों गद्दारों का काल बनकर स्वर्ग की राह में प्रस्थान कर गया।

   राजा सौदान सिंह और राजकुमारी ज्योति घायल होकर अपनी अंतिम घड़ियों को जी रहे थे। ये कुछ अंतिम घड़ियां उनके जीवन की खास घड़ियां थीं। आज राजकुमारी ज्योति घिसटकर राजा सौदान सिंह के इतने नजदीक आ गयी कि दोनों एक दूसरे की सांसों को महसूस कर सकते थे।

  " महाराज। आज तो हमारा विवाह है। पंडितों ने इसी समय का मुहूर्त तो निकाला था। फिर हमारा विवाह होगा। इसी समय होगा। अपने शरीर से निकलते रक्त से मेरी मांग भर दीजिये।अब हम जहाँ भी जायेंगे, साथ साथ जायेंगें।"

   राजा सौदान सिंह ने अपने रक्त से ज्योति की सूनी मांग भर दी। फिर दोनों ही पति पत्नी एक अनंत यात्रा की तरफ निकल गये। रणभूमि में उनके शरीर रह गये। एक दूसरे से आलिंगन बद्ध।देशप्रेम की बेदी पर अपना जीवन लगाने से पूर्व दोनों का मिलन हो गया।

पुनः निवेदन : यह पूर्णतः काल्पनिक कहानी है। यदि इस कहानी का किसी घटना से संबंध पाया जाये तो उसे मात्र एक संयोग समझा जाये। 

समाप्त
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'