नारी हूँ, स्त्री हूँ, औरत हूँ
जो चाहे कहलो मुझको
हाँ मैं ही पुरुष की शोहरत हूँ
त्याग है मुझमें, समर्पण की मूरत हूँ
अपनों के लिए सदैव करती स्वयं को अर्पण हूँ
प्रेम परिपूर्ण हो जिसमें, ऐसी स्नेह की सूरत हूँ
स्वेच्छा से बंधन भी स्वीकार मुझे
परिवार कूल के खातिर सहन तिरस्कार मुझे
हो यदि कमियां कभी तो दंड अंगीकार मुझे
निज स्वाभिमान हित करना पडे जौहर यदि
किंचित नहीं भयभीत मैं जानती है हर सदी
युगों युगों से ज्ञात सबको आन पर मैं मर मिटी
हूँ पुरूष की भावना ,संवेदना है मुझसे ही
हूँ करूण रस ओर श्रृंगार भी तो मुझसे ही
अर्धांगनी हूँ स्वयं मैं शिव भी पूर्ण मुझसे ही
ममता हूँ, माधुर्य भी प्रेम की हूँ मैं अगन
प्रेमिका भी मैं ही हूँ प्रेमी रहे मुझमें मगन
हूँ राधिका मैं श्याम की वो करे मुझसे लगन
जीती हूँ मैं हर रोज भी चाहे मर-मर कर
अपने प्रिय को सुलाती अपनी निंदिया देकर
बच्चों की किलकारी में खुद को खोकर
हाँ मैं जी लेती हूँ थोड़ा हंस कर
अपनी इच्छा, अभिलाषा तो कबसे मेने छोड़ी
पितृ गृह में बढ़ते बढ़ते सबको मेने तोड़ी
लड़की हो तुम नियन्त्रण में रहना सीखो
बस वहीं से बंधन की सारी सीमाएं जोड़ी
अब आंखो में स्वप्न नहीं है
इच्छाओं का मन पर कोई बोझ नहीं है
मान लिया है मेने हूँ मैं औरत
सबकुछ हूँ फिर भी केवल हूँ मैं औरत
कृष्णा की✍️ कलम से

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