सीवानों  में  नाच रहा है 
देख  घटा  को  मोर --
तुम्हारी याद आयी  
दूर  क्षितिज  से  चलती  पुरुवा 
दिल  देती  झकझोर --
   तुम्हारी याद आयी 
       🌴🌺🌺🌴
श्यामल-घट ले  उड़ते  बादल 
गांव - गांव  दे  फेरी 
आधी रात  छतों पर  बरसें  
आकर  चोरी - चोरी 
रिमझिम  बूंदों की  पायल ने 
किया  बहुत  है  शोर--
   तुम्हारी याद आयी 
      🌴🌺🌺🌴
दुर्दिन  में  एकाकी  पन  मैं 
कैसे  झेल रहा हूँ 
दिल को  झूठ  दिलासा  देकर 
दिल से  खेल रहा हूँ 
डगर-डगर मैं  नगर  तलाशूं
कहां  गयी  चितचोर--
   तुम्हारी याद आयी 
      🌴🌺🌺🌴
घटा  बरस कर  जोर जोर से 
जैसे  मुझपर  हंसती  थी 
रजनी की  काली  अलकें  ये 
बनकर  व्यालिनि डंसती थीं 
जीवन की  हे  अरुण  प्रभा  तुम 
चली  गयी  किस  ओर--
     तुम्हारी  याद  आयी 
         🌴🌺🌺🌴
   पुरवाई   का  हर  झोंका 
  स्पर्श  तुम्हारा  लगता था 
 मैं  विरही  पागल  बन करके
  निविड़-निशा में  जगता  था
  छलक रहे हैं  तनहाई में 
   आंखों से  अब  लोर--
     तुम्हारी याद आयी 
        🌴🌺🌺🌴
            --किञ्जल्क त्रिपाठी "किञ्जल्क"
                     आजमगढ़ (उ.प्र)