शादी के 8 साल हो गए थे,अभी तक महेश और महिमा के आंगन में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी ।देवर की शादी को अभी एक साल ही हुए कि नन्हे मेहमान का आगमन हो गया,घर  के कोने कोने में नन्हे बच्चे की किलकारियां गूंजने लगीं।
सास ने पूरे गांव में लड्डू बंटवाए,ढोल बाजे बजवाए गए। छटी भोज हुआ।

महिमा दौड़ दौड़ कर काम निपटाती ,देवरानी की सेवा करती ।
छठी के दिन सास ने मना कर दिया महिमा को , कि कमरे से बाहर मत निकलना ।
शुभ कार्य में तुम्हारा कोई काम नहीं,वैसे भी गांव की महिलाओं ने ताना मार मार कर हमारा जीना दुश्वार कर दिया था,फिर से तुम्हें देखेगी तो रंग में भंग पड़ेगा।
हमारे भाग्य फूटे थे कि लल्ला को तुझ जैसी बांझ मिली।
पता नही कौन से सुरखाब के पर लगे हैं तुझे छोड़ दूसरी शादी भी नहीं करता।
हे भगवान ! क्या होगा मेरे लल्ला का।उसका नाम लेने वाला भी कोई नहीं होगा।
बड़बड़ाती सास उसके कमरे से निकल कर चली गई।
ये जिल्लत उसे अधिकतर ही झेलनी पड़ती ,वो रोती और अपने भाग्य को कोसती।
सास के जाने के बाद ,महेश कमरे में आया,महिमा को रोते देख उसका मुंह उठा उसके आंसू पोछने लगा।
महिमा मेरी प्यारी महिमा_क्यों रोती हो। कोई कुछ भी बोले , मैं हूं ना तुम्हारे साथ ।
आज महिमा बहुत आहत थी, उसके सब्र का बांध आज पूरी तरह टूट चुका था ।उसने कहा मेरी क्या गलती है ,जो मुझे बच्चा नहीं, मैं भी हर स्त्री की तरह  पूर्ण होना चाहती हूं।
क्यों मैं आपकी कमी को खुद पर लपेटे जमाने भर के ताने सुनती हूं।क्यों नहीं बता देते कि कमी मुझमें है महिमा में नहीं।
माना की आपने मुझे बहुत प्यार दिया,लेकिन आपने मेरा साथ नहीं दिया ,हर महफिल में जब मैं जमाने के सामने जलील की जाती आप वहां से खिसक जाते।
आप एक बार तो कह देते कि,कोई इसपर बेकार के ताने न मारे , मैं झूम जाती मुझे बेऔलाद होना मंजूर था , मैं जिंदगी भर साथ निभा लेती ,लेकिन अब बस.....।
मैं अब न सहूंगी ताने ,मैं एक ही शर्त पर रहूंगी जब आप अपने घर वालों की अपनी कमी के बारे में बताएंगे।
महेश अवाक था,उसने महिमा से वादा लिया था , जब डॉक्टर ने पिता न बनने  की वजह उसमें बताई थी कि वो ये बात किसी को नहीं बताएगी।

महिमा ने उसकी बात मान ली थी,क्योंकि उसे भी अहसास था कि औरत से ज्यादा मर्द की खिल्ली उड़ाई जाती है ,इस समाज में।
महेश ने किसी तरह महिमा के हाथ पैर जोड़ मनाया कि ,आज रात तुम रुक जाओ,कल नया सवेरा होगा,हमारी जिंदगी में।
महिमा रुक गई, दोनों की आंखों में नींद कहां,रात कमरे की छत निहारते निकल गई।
भोर में कब आंख लग गई  पता ही नहीं चला,।

महेश की मां ,महिमा को सुना रही थी ,दिन चढ़ आया ,अभी तक महारानी जी सो रहीं हैं।
बच्चे को नहलाना है ,मालिश करनी है।सुधा के लिए मेवा पीसना है।
महेश उठा और कमरे से बाहर आकर , जोर से बोला _मां महिमा कुछ नहीं करेगी हम दोनो जा रहे हैं ,अपना बच्चा गोद लेने , मां नहीं बन पाने के लिए महिमा दोषी नहीं बल्कि मैं हूं  ,महिमा तैयार हो जाओ।
महेश की मां को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
घर भर में कोहराम मच गया।
आज महिमा खुश थी  ,बहुत खुश ....।