धरती माता करे पुकार,
बंद करो ये अत्याचार।

कितना बोझा  दोगे मुझ पर, 
हो गई हूं अब मैं लाचार।


जनसंख्या विस्फोट हो रहा, 
मानव अपने होश खो रहा। 

खींचातानी छीना झपटी, 
नींद चैन की कौन सो रहा।

संसाधन सीमित है कम है, 
इन बातों से वाकिफ हम हैं।

फिर भी अनुचित दोहन करके, 
 उनका भी अब निकला दम है।

पानी कम है हवा प्रदूषित,
अन्न नहीं हो रहे कुपोषित। 

भूख से मरते लोग कहीं तो, 
कहीं गरीबी से है शोषित।

महंगाई सुरसा सी बढ़ती, 
हर ग्रहणी जिससे है लड़ती।

जीवन जीना दूभर होता,
आवश्यकताएं हर पल बढ़ती। 

प्रकृति रहे संतुलित कैसे,  
अपनी गति से चले वह कैसे।

अप्राकृतिक व्यवहार झेलती,  
कब तक मौन रहे वह ऐसे। 
 
प्रकृति चीत्कार करती है, 
   त्राहि-त्राहि जनता करती है। 

मानव बेबस हो जाता है,  
प्रकृति जब तांडव करती है।
 
धरती को गर सुख देना है, 
हमको अब सीमित रहना है। 

बिगड़ चुका है चक्रधरा का,  
सुंदर रूप उसे देना है।
           
           प्रीति मनीष दुबे
            मण्डला (म.प्र)