आखिर स्त्री हूं भगवान नहीं हूं
मुझको भी आराम चाहिए
रोबोट कोई बेजान नहीं हूं
कोमल मन , सुंदर काया
है प्रभु ने क्या खूब बनाया
पर मत देखो बुरी निगाहों से
कोई सजावटी सामान नहीं हूं
एक शरीर पर काम हजारों
इतनी जिम्मेदारी मत डालो
फिर भी कहते करती क्या हो
भोली हूं पर नादान नहीं हूं।
एक मकान को घर बनाया
अपने हाथों से उसे सजाया
कहते हो,तेरा घर नहीं है ये
मालकिन हूं मेहमान नहीं हूं
बड़ों की सेवा , बच्चे पाले
घर और दफ्तर दोनों संभाले
अपनी नींद हराम किया है
मेहनत से अंजान नहीं हूं ।
पर थक जाती हूं मैं भी
आखिर स्त्री हूं भगवान नहीं हूं
संगीता शर्मा

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