भोली भाली मासूम वो एक लड़की 
बातों ही बातों में आंखे चार कर बैठी
इश्क़ का मामला था वो साहब 
घर की दहलीज पार कर बैठी 

रोका बहुत दिमाग़ ने, दिल की सुन बैठी 
रख बाप की इज्ज़त ताक पर 
वो किसी अजनबी से इजहार कर बैठी
छोड़ आंगन बाबुल का साजन संग चल पड़ी

चार दिन की चांदनी मौज में निकाल बैंठी
आया असली रूप सामने तब सोचा 
हाय, ये क्या कर बैठी 
हवस के पुजारी को राम समझ बैठी


टूटी बिखरी टुकड़ा टुकड़ा हो गई
हिम्मत समेट जाने कहां कहां से 
अपने सम्मान की दहलीज इस पार कर बैठी
बना लिया ख़ुद को फौलाद जज़्बात गवा बैठी

अब कोई रावण ना सिता को बहकाएगा
ख़ुद को पहचान हर मुश्किल के लिए तैयार कर बैठी
पहचान चिह्न अपने पराए हर इंसान की होगी नहीं
सोने का हिरण अब ना मुझको ललचाएगा
मै खुद को अब खुद की तलाश में लगा बैठी ।।।


© रेणु सिंह " राधे " ✍️
कोटा राजस्थान