तुम्हें सब कितना चाहें,ये तो बतला नहीं सकता।
सुबह उठते ही मैं न देखूँ ,तो मैं रह नहीं सकता।।

तुम्हे देखकर चैन मिले,दिल खुशियों से भर जाये।
आसानी से दिन कट जाये,मन रंगत से भर जाये।। 

तुम छुपे हुए जब रहते हो,आँखमिचोली करते हो।
मन कहीं नहीं लगता है ,क्यों ऐसा वैसा करते हो।।

क्या पता नहीं तुमको ये,दिन कैसे कैसे ढलता है।
बिना तुम्हारी गर्माहट के,कोई ऐसे कैसे पलता है।।

बहुत जरुरी साथ तुम्हारा,बिना तुम्हारे बीते ना।
कैसे कोई करे गुजारा,इक पल भी तो बीते ना।।

पौधों की वृद्धि रुकती है,ये पुष्प नहीं खिलता है।
फसल नहीं पकती कोई,ये फल नहीं मिलता है।।

सूर्यदेव तुम जग के स्वामी,अब निकलो खेलो ना।
कापें बूढ़े-बच्चे,पशु-पक्षी,धूप जरा अब ठेलो ना।।

एक बार दे जाते जीवन,सिर्फ तेरा ही एक सहारा।
समर्थ नहीं सब इस मौसम में,धूप ही एक सहारा।।

कितने मर जाते तुम बिन,शीत लहर की मार में।
ठंड से केवल सूर्य बचायें,इस बर्फीली बौछार में।।

इसी लिए सब तुमको चाहें,इस मौसम के प्यार में।
करो कृपा हे सूर्य देव तुम,धूप है तेरे अधिकार में।।


रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.