बचपन कुदरत का दिया उपहार
चहाचहाते संगीत का प्यार
बेफिक्र दुनियादारी से हरदम
बनते एक दूसरे का कंठहार

निकल पड़े दोस्तों की टोली संग
रहा नहीं जाता कभी हमसे निस्संग
बेबाकी से पुकारे एक दूसरे को ऐसे
लगे वातावरण में जैसे बजा हो मृदंग

होती दोस्तों संग हमेशा नई दुनिया की सैर 
समझते नहीं कभी भी एक दूसरे को गैर
कुछ नया करने की अभिलाषा रहे हरदम 
रहना ना चाहे कभी भी हम दोस्तों के बगैर 

रोज रोज की दौड़ से कभी नहीं उबते हैं 
दोस्तों को चिढ़ा, मज़ा कर हँसते गाते हैं 
माँ की आवाज़ भी कर देते हैं अनसुना 
परिवार सा एक दूसरे के दिलों में बसते हैं 
आरती झा(स्वरचित व मौलिक) 
दिल्ली 
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