हरने तिमिर अज्ञान का ज्ञान का  दीपक जलाता है,
संसार सागर में भटकते हमको जो मुक्ति देता है।

हरने को काम,क्रोध,लोभ,मोह जो जीवन में आता है,
देता है शिक्षा धर्म नीति की वो सच्चा गुरु कहलाता है।

गुरु ही ब्रह्मा,गुरु ही विष्णु, गुरु ही शिव कहलाता है,
द्वेष,कपट,छल,छंद दूर कर सद्धर्म का मार्ग दिखाता है।

गीली मिट्टी से जैसे बर्तन कुम्भकार बनाता है,
सत्य,धर्म से तराश कर वो सच्चा इंसान बनाता है।

बन कर माली पुष्पित करता जीवन को महकाता है,
औरों के खातिर डाली से होना वह जुदा सिखाता है।

अंधियारे से जीवन में जो प्रकाशपुंज ले आता है,
अस्तित्व से बोध कराकर जीवन का फलसफा बताता है।

सांसारिक सागर में न डूबे तैराकी हमें सिखाता है,
माया बन्धन से मुक्ति करा ईश्वर से हमें मिलाता है।

करता है ज्योतिर्मय पथ को अंधकार का नाश कराता है,
धरती   में  ऐसा  गुरु  साक्षात  ईस्वर  माना  जाता है।

निस्वार्थ भाव से करे प्रेम शिष्यों से वो होता है सच्चा गुरु,
इसलिए ईश्वर से भी बड़ा दुनिया में कहलाता है गुरु।।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश