बदल गया परिवेश,मुक्तिधाम में भी है पंगा।
रंग विरंगे कफ़न देख,असमंजस में माँ गंगा।
लाल चुनरिया ओढ़े आयें,लाशें गंगा जी तट।
संख्या देखो लाशों की,तो मन जाये गा फट।
राम नवमी ओढ़े आयें,कितनी कितनी लाशें।
कितने परिवारों की,टूट गयी अब सब आसें।
श्वेत कफ़न ओढ़ी लाशों,की भी कमी नहीं है।
महामारी से दुःखी लोगों,की भी कमी नहीं है।
कोई लाश जलाता दिखता, कोई उसे गाड़ता।
कोई करे प्रवाहित जल में,पुलिस उसे ताड़ता।
दिन रात जल रही लाशें,अपनों से जो दूर हुए।
विद्युतचिमनी भी गल जाती,प्रभु क्यों क्रूर हुए।
अनगिनत लाशों के लगे,मुक्तिधाम में अम्बार।
ये मंजर न देखा जाए,दुःख पीड़ा भरा अपार।
सच घिनौना है देखा,खींचें कफ़न कफ़न चोर।
गड़े मुर्दों के खींचें,लाल पीले नीले कफ़न चोर।
गंगा में बहती असंख्य लाशें,सड़ फूल उतराई।
पशु पक्षी नोंच रहे हैं,ये कैसी स्थिति बन आई।
मुक्तिधाम में ऐसा तो न,था कभी रहा परिवेश।
कोरोना महामारी से,बदला हुआ है ये परिवेश।
रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.

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