यूं हाथों से बिखर रहे रिश्ते,
जैसे माला के मोती बिखरते हैं।
हाथ छूट रहे हाथों से,
मानो एक दूजे से मुह फेर रहे।
जब तकती नजरें सर उठा दुनिया को,
बस वीरानी के साये दिखते हैं।
फिर क्यों बोलो हम तुम,
कैसा गुमान खुद पर करते हैं।
न तुम अमिट, न में अनश्वर हूं,
तो जानें क्यों हम एक दूजे से जलते हैं।
हम तुम एक नइया में बैठे,
फिर भी क्यूं बदला सा है मंज़र।
जैसे सिमट गया हो समंदर
रेतीले रेगिस्तानों में।
यूं हाथों से बिखर रहे रिश्ते,
जैसे माला के मोती बिखरते हैं।
आरना दूबे

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