जन्म से लेकर मृत्यु तक
संस्कार ही तो होते हैं
किसी संस्कार में हंसते हैं
तो किसी में रोते हैं
संस्कार से सुसंस्कृत होते हैं
साधारण से श्रेष्ठ बनते हैं
वेदों में सोलह संस्कार बताते हैं
मन दर्पण पर पड़ी धूल मिटाते हैं
गर्भधान से लेकर पुंसवन तक
सीमन्तोन्नयन फिर जातकर्म
नामकरण और निष्क्रमण संस्कार
अन्नप्राशन और मुंडन के साथ
कर्णभेदन और विधारंभ भी
उपनयन और वेदारंभ संस्कार
केशान्त और स्मवर्तन संस्कार
विवाह संस्कार और अंतिम
अन्त्येष्टि संस्कार होता हैं
मन मस्तिष्क से लेकर तन को
भी जो निर्मल पावन करती हैं
संस्कार ही तो वो शक्ति हैं
जो जीवन को सुगम बनाती हैं
जीने क़ी राह दिखाती हैं
जीवात्मा को आवागमन से
मुक्त कर मोक्ष प्रदान करती हैं
नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

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