आनंदिता क्या तुम तैयार हो जाने के लिए श्रीमान जी ने जब आनंदिता से पूछा तो उसने कहा जी नहीं सुबह कितनी आपाधापी रहती है सारा काम एक साथ ही करना होता है मैं थोड़ी लेट हूं वोटिंग के लिए आपको बाहर जाना है आप हो आइए मैं फ्री होकर चली जाऊंगी काम से निवृत्त होकर आनंदिता स्कूल की ओर निकल पड़ जाती है वह सोचने लगी स्कूल में मताधिकार के महत्व के बारे में पढ़ाया और समझाया जाता हैं ताकि आम नागरिक सरकार की ओर से प्राप्त होने वाली योजनाओं से वंचित ना हो जिसके लिए आप को मतदान करना नितांत आवश्यक होता हैं। आखिर एक जागरूक नागरिक की भूमिका भी निभानी होती है जरूरी मूलभूत सुविधाओं के लिए ....
सड़क पर अलग-अलग खेमे के लोग अपने चिर परिचित मुस्कान, अभिवादन के साथ भाभी जी याद रखिएगा कहकर याद दिला रहे हैं
कि कतार में इस बार हम भी शामिल हैं।
कि हमें भी एक मौका देकर तो देखिए पिछली वाली गलती को नहीं दोहराएंगे।
कि जीत या हार हो खड़े होने में क्या जाता है दोनों ही स्थिति में हम तो खुश हैं कि हमने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई एक उम्मीदवार के रूप में परवाह नहीं पैसे का कितना अपव्यय हुआ।
कि हमें तो बड़े दलों का सहयोग ही प्राप्त नहीं हुआ इसलिए निर्दलीय खड़े हो गए हम सबसे अलग तंत्र की स्थापना करेंगे।
गेट पर पहुंचते ही आप अपना फोन अंदर नहीं ले जा सकती हैं यहीं पर रखना पड़ेगा।
यहां कैसे गुम हो गया तो
हम हैं ना मैडम
ओह पहले पता होता तो गाड़ी में ही रख कर आती।
प्रसिद्ध स्कूल का प्रांगण काफी बड़ा और एंट्रेस में अनेक सूचना पटल ,कुछ विशेष बातों से समाहित तस्वीर और पेंटिंग दीवारों पर सुशोभित हो रहे थे आगे बढ़ते ही स्कूल के मुख्य प्रांगण में खूबसूरत बगीचा और बीच में एक कुंड का निर्माण हो रखा था जिसमें कमल के बैगनी फूल खिले हुए थे विशिष्ट तिथि जो है आज लोकतंत्र का ।
लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करते हुए वोटिंग कर बाहर आई आनंदिता का ध्यान वापस उन्ही दीवारों की ओर ध्यानाकर्षित हो रहा था स्कूल के वातावरण को निहारते हुए वह स्लोप से नीचे उतरने लगी लेकिन दो कदम के बाद पैर स्लिप और आनंदिता नीचे गिर गई , चप्पल पैर से निकलकर दूर जा गिरा ।
उठने के बाद सबसे पहले मनुष्य प्रवृत्ति की वजह से उसने देखा आसपास कोई देख तो नहीं रहा गनीमत है पीछे एक आंटी जी आ रही थी और एक लड़के ने कहा दीदी कैसे गिर गई कोई चोट तो नहीं आई।
आनंदिता ने उससे कहा नहीं मैं ठीक हूं और जाकर चप्पल को उठाया बीच से दो भागों में विभाजित किनारे से थोड़ा अभी भी साथ नहीं छूटा हैं उसे पहनकर और अपने मोबाइल को लेकर वह जैसे तैसे गाड़ी के पास पहुंची।
चप्पल की दुकान में जाकर देखती हूं बन गया तो बनवा लेती हूं या फिर एक स्लीपर तो लेनी ही थी डेली यूज़ के लिए उसे ही ले आऊंगी।
थोड़ी देर में चप्पल की दुकान पर देखिए आपने जो चप्पल दी थी उसका क्या हाल हुआ है देने के समय तो बड़ी खूबियां बताई थी आपने आपके पैरों पर बहुत सुंदर लग रही है , मजबूत है तोड़ मरोड़ कर भी दिखाया था आपने
अजी यह तो फैंसी है और आप अपना वेट भी तो देखिए आनंदिता अंदर से तमतमा गई डेढ़ सौ किलो का इंसान भी चप्पल पहनता है और यह मेरी वजन पर कॉमेंट कर रहे हैं। उसने इस पर गुस्से से कहा बन जाए तो देखिए नहीं तो मैं जाती हूं
लड़के को भेज कर
मोची के पास छोड़ कर आना पड़ेगा
उनके पास तो गम होता है ना या फिर सीलकर दे दे
तब तक आप दूसरी चप्पल देख लीजिए ना मैडम जी
जी उसकी जरूरत नहीं है अभी बनती है तो ठीक नहीं तो घर पर तो रखी हुई है ।
मोची के पास गया हुआ वह लड़का वापस आता है उसने कहा छोड़कर जाना पड़ेगा आनंदिता ने कहा रहने दीजिए इतना समय अभी नहीं और वह चप्पल की दुकान से बाहर निकल आई
"लेते वक्त तो जनाब का बिल्कुल अलग था रवैया"
सर्वहित सुखाय की जगह आजकल स्वार्थ प्रवृत्ति सुखाए का चलन है उनकी इस प्रवृत्ति ने अपना एक अच्छा कस्टमर खो दिया बस और कुछ नहीं.....
दुकान का सामान बेचते हुए कितनी चिकनी चुपड़ी बातों का इस्तेमाल करते हैं और दावे भी करते हैं कि अगर कुछ परेशानी या समस्या हुई तो बदली भी जाएगी लेकिन जाने पर न जाने वो क्यों दिखाते हैं अपना अलग रवैय्या।

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