ये चाय की केतली ,ये चुस्कियां चाय की,
इन लिपटी हुई खुशबुओं में कहानियां महकी.!"
दूर एक गांव की जाती हुई सड़क ...
बारिश का मौसम..आसमां में घनघोर काली घटा ... चारों ओर पानी -पानी होती जिंदगी ..!
शाम का वक्त..!
तेज गड़गड़ाहट मूसलाधार , तूफान आने का संकेत दे रही थी ...! पल -पल ,मौसम करवट ले रहा था ..जोरों की हवा सांय -सांय चल रही थी ... तापमान में ठंडक थी ..! आसमां में बिजली भी कहर बरपा रही थी .!
किनारे पर एक चाय की घास -फूस से बनी ..चार -छ:बलल्लियों से खड़ी चाय की दुकान ..बाहर छोटे से आंगन में लालटेन टंगी हवा से हिलती..बुझने को तैयार ..!
अंदर रंगी- पुती अस्त व्यस्त ,सीलन भरी दीवारों के पीछे एक कंकाल सा चेहरा ..ऐसा लगता था जीवन की अनियमित मार की अनकही दास्तां कह रहा हो ..। कई सावन आए और गए ... भादों आए और गए ..।
लेकिन उसके जीवन को कोई हरा ना कर पाए काले स्याह घेरे ,आंखों के नीचे रह गए..। लगता था ,उस चेहरे में मासुमियत और सुंदरता का निखार सा लिहाफ रहा होगा कभी ..! यौवन के बसंत को उसने भी पार किया होगा .!
वह चारपाई पर उकड़ू पड़ी थी ...! सांसें अप्रत्याशित उस भट्टी की तरह थीं ,जो बुझ रही थी हल्के- हल्के अंगार की तरह ..! भट्टी पर रखी चाय की केतली , और उसमें चाय खत्म हो चुकी थी ..। आंखें और चाय भी इंतजार में थे , कि शायद ,कोई आ ही जाए चाय पीने वाला भारी बरसात में ..!
चाय की दुकानों से रोजगार एक जरिया अच्छा रहा होगा कभी । लेकिन ,आज मंदी की मार से बच ना पाया होगा वह भी ..।
बाहर सड़क के किनारे पर एक ट्रक रुकने की आवाज ..!
सीधे चाय की गुमटी की ओर मुड़ा ,धीरे से दरवाजे पर थाप दी ..।
जोर से चिल्लाया --,"कोई है अंदर ..?"
अंदर से महिला का स्वर आया ,"__ज्ज्जी जी ..।"
दरवाजा खोलने की खटपट सुनाई दी । उसने सामने देखा एक व्यक्ति बारिश में अच्छी तरह भीगा खड़ा था ,शायद , किसी गाड़ी का ड्राइवर रहा होगा ...!
व्यक्ति ने ऊपर से नीचे उस स्त्री को देखा ..!
उसने काले रंग की अंगिया पहनी थी ,सर पर बाल अस्त व्यस्त थे ..! एक पिछौड़ा व घाघरा व मटमेले रंग का दुपट्टा सर पर बांधा हुआ था ..! गले में लाल रंग की मोतियों का हार सजा था ..!
चेहरे के भाव से परेशान था , बोला"__चाय मिलेगी क्या ? मेरे ट्रक के इंजन में पानी घुस गया है ,गाड़ी स्टार्ट नहीं हो रही है, कोई साधन भी नहीं दिख रहा है ; जब तक कोई इंतजाम नहीं होता यहां रुक सकता हूं क्या ?"
वह बोली ,"---ज्जी जी ,आइए ..!"
"कितना टाइम लगेगा ? ," वह बोला ..!
वह बोली,--"महाशय ! बस जरा टेम दीजिए ,अभी जल्दी चाय बनाती हूं बैठिए..!"
उसने बाहर एक गंदे से बेंच की ओर इशारा किया ..। वह पानी से बचता हुआ एक कोने में उस बेंच पर किसी तरह बैठ गया ..!
वह लिपी हुई अंगीठी में कोयले झौंक कर लोहे की पाइप से हवा दे रही थी , ताकि अंगार भड़के व ही जल्द चाय बने ..! चाय की केतली चढ़ी थी ...उसकी तीतर जैसी आंखों के सच, आंखों के घेरों से भी अधिक स्याह थे ..!
चाय बनकर तैयार हो गई .. केतली से उढ़ेली व गंदे से कांच के गिलास में डाली व आगे बढ़ा दी ...! हाथों में कोयले की कालिख लगी थी ..!
व्यक्ति ने गर्म -गर्म चाय पी ..!
उसने अपने चांदी के कड़ों को ऊपर चढ़ाया और बाहर किनारे, जहां टीन शेड बना था वहीं, बर्तन धोने चली गई ..!
कुछ देर बाद वह व्यक्ति बोला ,"-- क्या आज रात मैं यहां रुक सकता हूं ? बाहर बारिश के हालात सही नहीं लग रहें हैं !"
"ज्जी..!"वह संकोच से बोली ।
बोला,--"पहले भी इस रास्ते गुजरता रहा हूं ,आज पहली बार रूका इधर , इतना तूफान -पानी पहली बार देखा !"
वह कुछ शंकित हुई फिर हल्के से हां में सर हिला दी ..!
बोला ,----" यहां इस गांव में ..बालू रहता था ..! आप जानती हो उसे.. ? "
वह बोली ,"---जी परंतु आप कैसे जानते हो उसे ?"
वह बोली ,"---जी परंतु आप कैसे जानते हो उसे ?"
"जी जानता हूं !" उसने संशय के बादलों को हटाया और कहा ..!
उधर ..
चूल्हे में सीलन भरी लकड़ियों से धुंआ- धुंआ होता था ..! फिर भी वह खाना बनाने में लगी रही ..! जैसा भी रूखा सूखा बन पड़ा बनाया ..इतना बड़ा अनाज का भंडार तो था नहीं ..बस एक छोटे से खेत में थोड़ा सी " पोई "(हरी सब्जी) के पत्ते व मक्का बोए हुए थे जो कभी बरसात के बाद अक्सर फल लग जाते थे ।
राहगीर के आगे परोस दिया .। मंडवा भी जाने कब से कनस्तर में पड़ा- पड़ा कराह रहा था उसे ही निकाल कर मलने लगी । मोटी -मोटी चार रोटी बनाकर उसके आगे परोस दी ..!
" भूख भली कि सूखी -रोटी "यह सोच राहगीर ने आनंद से चुपचाप खाना खाया ।
अपनी उत्सुकता को आगे बढ़ाते हुए बोली ,"_ साब आप बता रहे थे ना बालू के बारे में ...!"
राहगीर बीच में ही बोला ,--" जी ..!"
बालू को मैंने खेल -दिवस में गौचर मेले (उत्तराखंड का विशाल मेला) देखा था । वह बहुत ही अच्छा धावक था .. वहां उसे पहला स्थान के लिए पदक भी मिला ! याद है मुझे खेल मास्टर ने कहा था ,-" बालू तुम गांव में ना होते तो आज ओलंपिक में भारत की शान होते..! अच्छा खिलाड़ी होने पर खेल को का ना अपना सका ,शहर ना जा पाया ! घर की खस्ता हालत जो थी ..!"
वह बोली ,"--- हहहहां .. अच्छी तरह से जानती हूं उसे ...पर अब नहीं रहता वो ..!"
वह आतुरता वश बोला__"अब कहां गया वो..?"
"वह भी एक कहानी का हादसा है साब !"...वह धीरे स्वर में बोली ..!
--"क्या हादसा हुआ...??कौन सा हादसा ?"
बारिश थमती ना थी और गुमटी के भीतर पानी टप-टप कहीं कहीं टपक रहा था ! चाय की केतली व भट्टी भी अभी गर्म अहसास को ओढ़े हुए थी ..।
वह आगे बताने लगी .."मां ,बहन व वह साथ रहते थे ! बहुत अच्छा लड़का था बालू । खेल कूद में हमेशा पहला स्थान ही आता था , छोटी उम्र में ही फौज में भर्ती हो गया था । शक्ल सूरत में बहन थोड़ी सांवली थी रिश्ते भी उम्र पर नहीं आ रहे थे जो आता घर में मना करके चला जाता था । ...ड्राइवर साब.. !! उमर पक्की हो रही थी, उम्मीदें कच्ची .. ! किसी तरह से एक रिश्ता समझ आया था !
शादी की तैयारियां शुरु हुई ..
यही बारिश थी ..यही पानी और यही गर्जना की लगातार मूसलाधार ..! बारात द्वार पर पहुंच चुकी थी । अचानक ..!! बिजली गुल हो गई , बाहर बैंड -बाजों का शोर ! जोर -जोर से गड़गड़ाहट में अंदर कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था..! मां ने देखा बालू बहुत देर से बरात की स्वागत तैयारी में नहीं पहुंचा ,जाकर ढूंढा कहीं नहीं मिला रहा था !
तभी ..वहां देखा ,वह जड़ हो गई ,बेटे का शरीर आड़ू के पेड़ के नीचे शांत पड़ा था। ऊपर बिजली गिर चुकी थी साब ..!! शरीर बिल्कुल नीलाकाला पड़ चुका था । बालू की मां को लगा कि बारात का क्या होगा ? इससे बड़ा अपशकुन क्या हो सकता था .. घर में जवान बेटे की लाश का मातम मनाए या बाहर बरातियों की आवभगत करें ..? अपशगुन हो गया था ..। सारे शुभ काम भी बालू के मामा के लड़के से करवाए ..। राजपूतनी थी पक्की और फौजी की मां भी ..।
घर में किसी को भी भनक ना लगने दी .।
लोगों ने बालू के लिए पूछा भी ..। उत्तर तो दिया परन्तु बहुत सम्भलकर ,उसने कह दिया कि,बालू की अचानक छुट्टी खत्म कर दी गई है ,उसे वापस सीमा में ड्यूटी की तैनाती पर बुला गया है ।
एक जगह अंधेरे कमरे में जाकर खूब रोई साब खूब रोई ..! उसे मालूम था अगर वह बताएगी तो बरात वापस लौट जाएगी ..! जवान लड़की अपशकुनी कहकर हमेशा के लिए घर में कुंवारी रह जाएगी ..।
उसने आंसू पोंछे व खुशी -खुशी विवाह के सारे कारज अच्छे से निपटाए ..। अंदर नीचे गौ शाला में उसने लाश छिपा कर रख दी और बेटी को अच्छी तरह से विदा किया ..! ऐसी थी उसकी कहानी ड्राइवर साब...!! "
बाहर घासलेट की लालटेन पर तेल खत्म होने को था उसने उतारा और तेल डालकर वापस वहीं टांग दी ..।
उसने उसी बेंच को थोड़ा भीतर खिसका कर एक रजाई का खोल अतिथि को दिया और कोने में वह भी दुबक गई ।
वह भी गहरी चिंता में था कि , प्रातः काल क्या होगा उसका वहां से कैसे निकलेगा ?!!!
रात्रि अपनी सीमा पर करवट ले चुकी थी । भट्टी की राख ठंडी पड़ चुकी थी ..! केतली भी उसकी कहानी की गवाही दे रही थी । सुबह होने के लिए पुनः प्रतिक्षा में थी ।
सुबह के पांच बज चुके थे ..।
राहगीर उठा ..! जाने की तैयारी करने लगा..।
तभी सुबह मौसम खुलने लगा था... हरियाली दूर- दूर तक अपना आवरण बिछाए हुए थी । सूर्य की चमक भी चाय की केतली तक पड़ चुकी थी । वह भी गर्म भट्टी में तैयार थी । एक नई कहानी के लिए ।
तभी राहगीर की नज़र एक काले बक्से पर पड़ी ..
उस बक्से में सुबेदार 'बलवन 'सिहं रावत(Sb.Balwan Singh ) लिखा मिला ..।
वह समझ ना पाया कि यह कौन है ? उसकी मां होगी शायद पूछने की वह हिम्मत ना जुटा पाया ..।
उस स्त्री से विदा ले सड़क पर निकल गया ।
तभी .. सड़क पर एक गाड़ी आती दिखाई दी ,उसका ड्राइवर राहगीर का पहचान वाला था ,गाड़ी में बैठा व अपनी उत्सुकता को काबू ना कर पाया ।
पूछा,_" यह गांव में इस सड़क में चाय की दुकान है ना ?" "हां ... क्यों.!"ड्राइवर बोला
वह बोला ,-" किसकी है वह ?"
"अरे भाई बालू फौजी की मां की है । बहुत हिम्मती है । वह अकेले कई सालों से दुकान चला रही है वहां ..। "
--"क्या कोई नहीं उसका ?"
--"कोई होता तो भट्टी में चाय की केतली चढ़ाती क्या ?"
राहगीर को जवाब मिल गया था ..! वह चुपचाप मौन "चाय की केतली "को सोच रहा था । जिसने कई मौसम यों ही भट्टी में गुजार दिए थे । लेकिन ,आग का दामन ना छोड़ा कभी ..!
इति
सुनंदा ☺️

0 टिप्पणियाँ