एक स्त्री बड़ी सी बड़ी बातों को झेल सकती है। किसी भी स्थिति से अकेली निपट सकती है। जरूरत पड़ने पर यमराज से भी दो हाथ कर सकती है। पर अनेकों बार बहुत छोटी छोटी बातों से बिखरने लगती है। हालांकि जिन बातों को छोटा कहा जाता है, वे सचमुच छोटी नहीं होती है। अनेकों बार बहुत छोटी छोटी बातें बहुत गहरा अर्थ रखती हैं। अनेकों साधकों की साधना छोटी छोटी बातों से टूटी है। तो अनेकों बार छोटी छोटी बातें किसी को जीवन की राह दिखा जाती हैं।

   संध्या ने अपने जीवन में बहुत झेला। ईश्वर ने भी उसके जीवन में एक बार खुशियां दीं तो कुछ ही समय में छीन लीं। वैसे भी एक फौजी का जीवन तो वैसे भी मात्रभूमि के लिये ही होता है। इसलिये राजीव की शहादत पर संध्या को गर्व ही हुआ। 

  पर राजीव की शहादत पर राजीव द्वारा एक छोटी जाति की लड़की से विवाह कर लेना भारी पड़ गया। हालांकि आरंभ में ठाकुर साहब इस बात से मना करते रहे। पर फौजियों की गबाही, फौज के विभिन्न रिकोर्ड और राजीव द्वारा भी फौज के रिकोर्ड में दी गयी स्वीकृति स्पष्ट कर रही थी कि राजीव अविवाहित नहीं है। संध्या को उसने अपने पथ की संगिनी चुन लिया है। पर यह भी सत्य है कि मात्रभूमि के लिये वह खुद को बलिदान कर अपनी संगिनी को अकेली छोड़ गया है।

   उस समय ठाकुर साहब को समझाने के लिये राजीव न था। संध्या ने अपना प्रयास किया पर वह असफल रही। बात को बढाने बाले अनेकों समाज के रक्षक पैदा हो गये। ठाकुरों की आन मान की बात होने लगी। यद्यपि उन लोगों की बात का कोई महत्व न था। ठाकुर साहब जानते थे कि अनेकों कन्याओं को छोड़ यदि राजीव ने संध्या को अपना जीवन साथी चुना है तो निश्चित ही संध्या में कुछ अलग ही बात है। संध्या निश्चित ही उनकी उम्मीदों पर खरी उतरेगी। आखिर राजीव का कोई भी कृत्य उनके बारे में विचार किये बिना कब पूरा हुआ है। आज भी जब राजीव संसार छोड़ गया है, संध्या एक कुलबंती बधू की भांति उसके अंतिम पथ में साथ देने आयी है। हालांकि माना जा सकता है कि अब वह अपना जीवन फिर से आरंभ करने के लिये कानूनन स्वतंत्र है। पर ऐसा होगा नहीं। यह कन्या इतनी जल्दी अपना प्रेम भुला नहीं सकती।

    होना चाहिये था कि ठाकुर साहब अपने मन के भावों को बाहर ला पाते। अपनी पुत्रवधू के साथ संसार से लड़ पाते। पर हुआ कुछ अलग। समाज की छोटी मानसिकता जीत गयी। बड़प्पन हार गया। पर शायद ऐसा हुआ नहीं। यदि बड़प्पन हार जाता तो ठाकुर साहब मन ही मन अपनी बहू संध्या की सलामती की प्रार्थना क्यों करते।

   संध्या के जीवन में पुत्र प्रवेश का प्रवेश हुआ। वह अपने सारे दुख भूल गयी। अपनी ड्यूटी के साथ साथ अपने पुत्र का पालन भी करती रही। यह दूसरी बात है कि फौज ने भी उसकी स्थिति देखकर उसकी तैनाती सही स्थानों पर रखी ताकि वह फौज के साथ साथ माॅ के कर्तव्यों को भी बखूबी निभा सके। पुत्र की देखभाल के साथ साथ संध्या राजीव को किये बायदे को भी निभाती रही। ससुराल में हुए अपमान को भुला वह अपने ससुर और सास को खत लिखती रही। विभिन्न तरीकों से उन्हें मनाती रही। राजीव के समान ही उसे विश्वास था कि एक न एक दिन ससुर जी उसे स्वीकार कर लेंगें।

   जीवन आगे बढा। मायके बालों की नाराजगी कुछ दूर हुई। हालांकि संध्या समझ न सकी कि उस नाराजगी का होना और समाप्त होने का वास्तविक कारण केवल धन का लोभ था। जब संध्या ने विवाह कर लिया तब मनोज और ज्योति को अपने अरमान मिटते नजर आये।हालांकि संध्या हर महीने घर पैसे भेजती रही थी। पर उस धन का कभी भी सदुपयोग नहीं हुआ। ऐशोआराम की जिंदगी जीने के लिये बड़ी से बड़ी आय कम पड़ जाती है। यदि कुछ बचत कर मोहन और ज्योति कुछ रोजगार कर लेते तो उन्हें किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत न होती।

   अरमानों के धराशायी होने का सबसे पहला प्रभाव भाई बहन के रिश्तों पर पड़ा। रामदास और कस्तूरी देवी के लिये भी बेटे का सुख अधिक महत्वपूर्ण था। अंतर्जातीय विवाह का झूठा रोना रोया गया। जबकि खुद की बिरादरी में ही बेटी के लिये आये रिश्तों के प्रति उदासीन रहे थे।

   पर जब लगने लगा कि संध्या के बिना काम नहीं चलेगा तब फिर से माफ कर देने का नाटक किया गया। ठीक है कि आवेश में आकर बेटी से भूल हो गयी। तो क्या बेटी का परित्याग कर दिया जायेगा। संध्या से पुनः धन मिलने लगा पर वह पहले से काफी कम था। अब संध्या एक बेटे की माॅ भी थी। वह अपने बेटे का भविष्य भी सोच रही थी।

   लगता है कि मनोज की अकर्मण्यता ही वह बजह थी कि फिर से रिश्ते की शुरुआत हुई। हालांकि अभी सत्य और अधिक भयानक था। भले ही अंतर्जातीय विवाह के कारण संध्या से नाराजगी दिखाई हो पर राजीव की शहादत के बाद उसके मदों पर मनोज और ज्योति की नजर थी। जबकि संध्या उस मद को ही अपने ससुर जी के सम्मान में भुला बैठी थी।

  मनोज को विश्वास था कि कभी न कभी वह किसी न किसी बहाने से बहन से बड़ी रकम ऐंठ ही लेगा। पर शायद उसे पता नहीं था कि ईश्वर की लाठी में अपार शक्ति होती है।

   पिछले चार महीनों से संध्या ने ठाकुर साहब को कोई खत नहीं लिखा था। इन चार महीनों में वह जीवन के अनेकों झंझावातों से गुजर चुकी थी। चार महीनों में बहुत बदल गया था। हालांकि लगता है कि राजीव को किया वायदा अभी भी उसके साथ था। लगता है कि खुद को पूरी तरह बदलना चाह रही संध्या खुद को पूरी तरह बदल नहीं पायी। तभी तो सभी रिश्तों की बांध को तोड़ देने के बाद एक बार फिर से उसी धार में बहने को तैयार हो गयी।

   जब मनुष्य को लगने लगता है कि उसका सब कुछ खो गया, उसी समय आरंभ होता है, उसकी प्राप्ति का जिसकी चाह हमेशा मन में रही हो। समय कुछ ऐसी ही चाल चल रहा है। संध्या ने जितना खोया है, उससे बहुत ज्यादा उसे मिलने बाला है। शायद इतनी की उम्मीद भी उसने कभी न की होगी।

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'