बार बार मन में उमड़ते भावों को ही अंतर्द्वंद्व कहते हैं। आगे बढकर भी मनुष्य एक बार रुककर अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहता है। उसके आगे बढने की गति कम होती जाती है। वह बार बार रुककर पीछे देखने लगना है। लगता है कि वह कभी भी वापस पीछे जाने लगेगा। अथवा अपनी पिछली यादों से दूर जाने के लिये सरपट भागता जायेगा। शायद वह रुकना चाहेगा भी नहीं। पर ऐसा हो कब पाता है।
भले ही संध्या अपने मायके से अलग रहने लगी पर मन से पुरानी यादें निकली नहीं। बार बार अपनी उन्नति में माता पिता का योगदान याद आता रहा।
अच्छा या बुरा कुछ नहीं होता है। प्रेरणा किसी से भी मिल जाती है। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। वैसे भी पूर्ण निस्वार्थ भाव से संसार के संबंध कब चलते हैं। भले ही कुछ स्वार्थ रहा पर निश्चित ही संध्या की उन्नति में कुछ योगदान तो रामदास और कस्तूरी देवी का रहा ही।
प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक घटना को अपनी दृष्टि से सोचता है। कुछ लोग हर बात का गलत अर्थ निकालते हैं। तो कुछ हर बात में सही को तलाशते हैं।
हमेशा अपने परिवार की सहायता करती आयी संध्या आज पूर्ण सहायता न कर पाने के अपने निश्चय पर दुखी थी। मन में अपने निर्णय पर पछता रही थी। बार बार उसका मन करता कि वह अपने घर वापस जाये। अपने भाई की पूरी मदद कर दे।
मन का एक कौना अभी उसे रोक रहा था। आखिर राजीव के मद पर उसका क्या अधिकार। वह तो ससुर जी को ही समर्पित किया जायेगा। निश्चित ही राजीव मेरा पति है पर वह पुत्र तो ससुर जी का ही है। माता पिता का अधिकार हमेशा अधिक रहता है।
आपत्ति बड़ी सोच बालों को भी डिगा देती है। फिर जब खुद का भाई, माता और पिता ही संकट में हों तो उससे बड़ी आपत्ति भला क्या हो सकती है।
एक बार फिर विचारों ने पलटा खाया। सचमुच वह गलत है। राजीव के मद उसी के तो हैं। आखिर उसने राजीव के साथ विधिवत विवाह जो किया था। उसपर किसी अन्य का अधिकार कैसे हो सकता है।
ठीक है कि पिता का दर्जा ऊपर होता है। पर ससुर जी ने किया क्या था। खुद के पुत्र का त्याग। अपने शहीद पुत्र को कंधा देने से भी मना कर दिया। राजीव को तो अग्नि भी उनके हाथों से नहीं मिली जिन्हें वह अपना समझता था।
मृत्यु के बाद भी जीवन रहता है। परलोक गया हुआ भी कब परलोक जाता है। यदि चला जाता है तो यादों में कौन आकर अपने अस्तित्व का परिचय देता है।
राजीव। मुझे माफ कर दो। जिस तरह आपके लिये आपके माता पिता सम्माननीय हैं, मेरे लिये मेरे माता पिता भी उतने ही सम्माननीय हैं। बड़ों की गलती कभी गलती नहीं मानी जाती है। वह तो जीवन में आगे बढने की प्रेरणा देती है। गलती किसी की नहीं है। न आपके माता पिता की और न मेरे माता पिता की। गलती तो शायद उन परिस्थितियों की है जिनमें मनुष्य अपना विवेक खो देता है। धर्म और अधर्म का विचार भी भुला देता है। कर्तव्यों को भूल केवल अधिकारों की इच्छा रखता है।
माता पिता का ऋण क्या केवल पुत्र पर ही चढता है। निश्चित ही अवधारणा में कुछ संशोधन की आवश्यकता है। यदि पुत्र और पुत्री दोनों समान होते हैं तो फिर नियम भी दोनों पर बराबर होते हैं।
आखिर संध्या ने अपने माता पिता को और भाई को संकट से निकालने के लिये वह करने का निश्चय कर लिया जो अभी तक वह टालती आयी थी। हालांकि पुराना धन इतनी जल्दी नहीं मिलेगा। पर उसकी प्रक्रिया तो आरंभ करनी होगी। एक बार फिर से आर्मी के आफिस जाना होगा। सारे कागज तैयार करने होंगें।फिर भी उन मदों की प्राप्ति में कुछ महीने लग जायें।
संभव है कि सारी प्रक्रिया पूरी करने के लिये कुछ दिन आर्मी आफिस रुकना पड़े। संध्या ने जाने की तैयारी कर ली। साथ में छोटा बेटा भी था। तैयारी करते करते कुछ देर हो गयी। कुछ आलस्य या ईश्वर की प्रेरणा, शाम का भोजन बनाने की इच्छा न हुई। बेटे को साथ लेकर एक रैस्टोरेंट में शाम का खाना खाने चली गयी।
अनेकों बार झूठ सच का रूप रखकर संसार को भ्रमित करता है। धोखा मजबूरी का रूप रख लेता है। अनेकों बार सत्य उससे भी ज्यादा दुखदायी होता है जितना कि समझा जाता है।
शायद यह अच्छा रहा कि संध्या ने शाम को खुद खाना नहीं बनाया। शायद उसे उस रैस्टोरेंट में धोखे की एक और कहानी को देखना था। ऐसी कहानी जिसे पढकर शायद ही फिर उसका किसी पर विश्वास करने का मन होगा।
आगे बढता हुआ मनुष्य अनेकों बार रुककर पीछे देखता है। वापस रुककर पीछे भी चलता है। पर जैसे ही उसे पीछे केवल और केवल धोखा दिखाई देता है फिर वह आगे बढता नहीं है, अपितु तेजी से दौड़ने लगता है। फिर वह इतनी दूर जाकर ही रुकता है कि चाहकर भी उसे वह कुछ देख न सके। पर वास्तव में ऐसा हो कब पाता है। मन के जख्म उसे बार बार उन धोखों की याद दिलाते हैं। फिर वह संसार से विरक्ति की राह पकड़ लेता है।
संसार से विरक्ति निश्चित ही सन्यास मानी जाती है। पर धोखे के कारण हुई विरक्ति कभी भी सन्यास नहीं होती। चाहे वह सोहन हो या संध्या। दोनों को अपने पुराने जीवन में आना ही होता है।
निश्चित ही विवेक वह गुण है जिसमें एक स्त्री हमेशा पुरुष को पीछे छोड़ देती है। पुरुष और स्त्री दोनों ही विचलित होते हैं। पर विवेक का आसरा लेकर एक स्त्री जल्द ही सही राह पर आ जाती है। पुरुष को तो सही और गलत समझने में ही वर्षों लग जाते हैं।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

0 टिप्पणियाँ