तिमिर व्याप्त सर्वत्र,
उद्दिग्न अति हृदय।
दिखता नहीं है पथ,
पथिक है हतप्रभ।
बढ़ाए कदम किधर,
मन में है दुविधा।
सफल या असफल,
लगी है यह चिंता।
झंझावात का है शोर,
आंधियाँ चहुँओर।
तरंगे उद्वेलित हो रही,
डगमगाए नाव की छोर।
प्रेम पथ अति विकट,
प्रिय से मिलन दुर्लभ।
प्रेयसी विरह में रत,
नयन ताके एकटक।
नहीं मिला है कभी ,
कुछ अधीर होने से।
पाने की सोचो सदा।
पहले कुछ खोने से।
मिल जाये कहीं से,
आस की एक रश्मि।
पकड़ लो उसे कसकर,
न हो जाना तुम भ्रमित।
नवीन संकल्प के साथ,
नैनों में भर लो आस।
हृदय प्रदीप्त कर लो,
नए विश्वास के साथ।
तिमिर का जाल काट दो,
आंधियों का रुख मोड़ दो।
तरंगों को जड़वत कर दो,
प्रेम को पल्लवित कर दो।
संकल्प से ही होता है।
आंधियों का सामना।
कायरों के लिए कभी,
कोई मार्ग नहीं बना।
उत्साही जीत लेता है।
जंग बड़े और मुश्किल,
संकल्प दीप प्रज्ज्वलित तो,
क्या कर लेगा गहन तिमिर।
सुदृढ कर लोगे संकल्प,
हृदय के हर कोने में,
कोई रोक सकता नहीं,
तुम्हें कामयाब होने से।
सत्य पथ को चुनकर,
असत्य को ठुकराकर।
नैतिक मूल्यों को गहकर,
हो विजय पथ पर अग्रसर।
स्नेहलता पाण्डेय "स्नेह"✍️✍️
नई दिल्ली

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