नजर नजर का फेर बड़ा है
 गहरे राज ये  खोलती हैं 
आंखें सब कुछ तौलती  हैं 
आंखें सब कुछ बोलती हैं 
दिल की बात जुबां पर आए 
जुबा को तो सब चुप कर जाएं 
आंखों पर कोई वश नहीं चलता
 सारी बात बयां कर जाएं 
कभी प्यार छलकाए ये तो 
कभी ये अंगारे बरसाए
 कोई दिखावा कर ले चाहे  
ये तो सारे भेद बताए 
भली सोच है या शैतानी 
आंखों से हो जाए बयानी 
मौन रहे फिर भी ये आंखें
 कह जाए सारी कहानी 
मुश्किल है आसान नहीं है 
आंखों की भाषा को पढ़ना 
भले बुरे की सूझ परख से
   इंसानी रिश्तो को गढ़ना
      प्रीति मनीष दुबे
     मण्डला मप्र