पल पल मन मे बीज प्रेम के ये ही बोती है।
करती है सच को उजागर,नही छिपाती कुछ भी।
मगर छिपाना चाहे तो फिर नही बताती कुछ भी।
मनको सबके पढने की कोशिश में रहती है।
पल पल मन मे बीज प्रेम के ये ही बोती है।
झुक जाए तो लगता है घनघोर घटा छाई है।
उठ जाए तो लगता है सुबह ने लाली फैलाई है।
बरस बरस कर मन के सारे दुखड़े ये कहती है।
पल पल मन मे बीज प्रेम के ये ही बोती है।
कभी शिकायत करती है,कभी हिदायत देती है।
कभी कभी दिल की बातों को दिल मे रहने देती है।
कभी किसी याद में हँसती, ख्वाब में रोती है।
पल पल मन मे बीज प्रेम के ये ही बोती है।
स्वरचित

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