बड़ा ही व्यापक शब्द है...
एहसास या अनुभूति...।
और विरोधाभास की तरह...
बड़ा ही संकुचित भी...।
किसी एक बिंदु पे आकर ...
तेरे एहसास से ...।
कुछ अलग होंगे मेरे एहसास...
भले ही विश्वास रहे विश्वास से ...।
जब बीतेगी मन पर दुखों की वेदना...
या सुखों के गहरे समंदर में...।
जब कहीं खो जाऊंगी,
अनगिनत लिए बवंडर मैं...।
क्या तुम भी जी उठोगे ... उसी तरह
मेरे उस पल की भावनाओं को ...।
पीड़ाओं को ....
या सूख के उस प्रतिमाओं को...।
सम्भवतः नहीं...
तुम मात्र कल्पना कर सकते हो...।
मेरी मनस्थिति की...,
पर उसे जी नहीं सकते हो ...।
मेरी वेदना... संवेदना ले नहीं सकते
उस स्थित बिंदु के पास से ...।
भले गुजर जाओगे
परन्तु वंचित रह जाओगे मेरे एहसास से।
मैं भी कैसे दावा कर दूं...कि...
तुम्हारी पीड़ा समझ सकती हूं...।
तुम्हारी खुशी में...
वही प्रफुल्लता जी सकती हूं...।
वास्तव में तुम जो होते हो...उस बिंदु पे...
तुम्हारा व्यक्तिगत एहसास है...।
मैं उसे जी सकती हूं...
भ्रमित करता हूआ ये मेरा आभास है।
कल्पना में...भले जी लूं पर...
तुम्हारी तरह जी न पाऊंगी।
यथार्थ की धरातल पर...
दिखावे की झीनी चादर..चाहे ओढ़ जाऊंगी।
एहसास प्रकृति के अंदर...
व्यापकता का स्वरूप लिए समाता है...।
परन्तु ...किसी एक बिंदु पे जाकर...
यह व्यक्तिगत हो...संकुचित हो जाता है।
और किसी के लिए... किसी की सहानुभूति या खुशी ...,
मात्र छलावा बन रह जाती है।
किसी की संवेदनाओं की अनुभूति...
मात्र दिखावा बन गुजर जाती है।
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मौलिक व स्वरचित:-
कीर्ति रश्मि "नन्द
( वाराणसी) -

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