बंधन प्रित की हो या धागे की
हर रंग में दिखे इसके रूप नए
कभी मां की ममता में झलके
कभी बहनों के स्नेह  में दमके
कभी प्रिये के स्पर्श मात्र से 
हर गिरह  धागे के सुलझे।।


बंधन विलुप्त है संबंधो में,
समझते हुए अपनों के मन के भावों में,
देखते हुए उनके चक्षु के ख्वाबों में,
सुनते हुए उनकी हृदय की बातों में,
पढ़ते हुए उनके विवेक से ओतप्रोत विचारों में।।

कुछ यूं मुझमें टूट रहा है,बहुत कुछ यूंही छूट रहा है
रिश्तों में अनकही सी दूरी है,
डोर संवादों की, कहीं तो अधूरी है
सब व्यस्त हैं अपने अपने कामों में
बंद हो गये है सारे रिश्ते किताबों में।।

प्रेम बंधन के रस में सारे आसमान में कितने तारे, लेकिन चाँद अकेला है
उस चंदा की हूँ मैं चकोरी, उस पर हक तो मेरा है 
हसरत है मेरी ये तुझसे, मुझ संग स्वपन सजा ले तू
या फिर कफ़न ओढ़ा दे मुझको, मेरी याद मिटा दे तू ।।

बंधन कैसा तेरा मेरा,जैसे रात के बाद हो सवेरा
मेले ठेले की रवानी ,जैसे हो दादी नानी की कहानी
कभी अपनों सी तो, कभी सुनहरे सपनों सी
हाय, ये बंधन भी कैसी हो गई , अनसुलझी पहेली सी ।।