एक कविता उन लायक बेटों के नाम ..
जो कम उम्र में ही हो जातें हैं जवान।
ज़िम्मेदारी सम्भालनें में माँ -बाप का बटाँने लगते हाथ,
पढ़ाई के साथ-साथ करने लग जाते काम।
अपने देश में रोजगार ना मिले तो चले जाते देश अंजान ।
अपनो से दूर जाकर ग़ैरों से बढ़ाते जान पहचान ।
बचपन में जो किया करते थे नख़रे हज़ार,
अपनी रोटी का खुद करते इंतेज़ाम ।
घर की याद सताती तो रो लेते चुपचाप।
छुट्टी पर जब घर आते तो रहते परेशान ,
लौट कर फिर जाना है दूर देश अंजान ।
काश मिल जाता यहीं कहीं कोई अच्छा काम,
ज़िम्मेदारी का फर्ज़ निभाते रहकर अपनो के साथ।
ऐसे लायक बेटों को दिल से मेरा सलाम ।
हुमा अंसारी