जय श्रीकृष्ण 👏
आज मैं बात करने जा रही हूं।
भारत के सबसे उत्तम और मनोवांछित फल प्रदान करने वाली सूर्यषष्ठी व्रत का विधान सहित महात्म।
इस व्रत में सुर्य देव की पूजन की जाती है।
शास्त्रों के अनुसार सप्तमी तिथि को भगवान सूर्य की पूजा होती है।
कुछ नाम इस प्रकार है।
सूर्यसप्तमी, रथसप्तमी, अचलासप्तमी
बिहार में इस व्रत में सूर्यषष्ठी के दिन का विशेष महत्व है।
यह व्रत चतुर्थी तिथि से प्रारंभ होकर सप्तमी तिथि को समापन है।।
तृतीया तिथि से बाहर के भोजन का त्याग लहसन प्याज मरूआ मसूर वर्जित है।
चतुर्थी तिथि को कच्चा चावल,मुंग की दाल लौकी की सब्ज़ी प्रमुख भोजन अनिवार्य है।
पंचमी तिथि को सुबह से शाम तक बिना जल, निर्जला व्रत।
शाम के समय गाय के दूध चावल गुड़,का प्रसाद पीतल के बर्तन में बनाया जाता है।
गेहूं धोकर पीसकर के उसी की रोटी बनाई जाती है। विभिन्न प्रकार के फल फ्रूट और मिठाई से राणामाई का आवाह्न किया जाता है। सूर्यषष्ठी देव का आवाह्न किया जाता है उनको भोग लगाया जाता है।
हम पूजा आरंभ कर रहे हैं और आप हमारी पूजा स्वीकार करें।
इस प्रकार विनती करते हैं।
व्रती उसी प्रसाद को ग्रहण करते हैं।
यह एक ऐसा व्रत है इसमें कोई जातिवाद नहीं है।
इस व्रत में ग्वाल के यहां से घी,तेली के यहां से तेल,डोम के यहां से बांस की टोकरी, कुम्हार के यहां से मिट्टी के बर्तन अनिवार्य है। हमारे पौराणिक कथाओं में कहीं भी जाति भेदभाव नहीं दिखलाया गया है।
यह तो मनुष्य स्वयं ही अपने स्वेच्छा से सुविधानुसार इसका उपयोग करते आ रहे हैं।
षष्ठीतिथि को, सभी सामग्री जो कि लोग अक्सर एक माह पहले से ही जुटाना शुरू कर देते हैं।
जो इस प्रकार है।
मिट्टी के बर्तन, बांस के वर्तन, नारियल छिलके के साथ,ओल, अरबी, गन्ना, हल्दी का पौधा,अदरक का पौधा, मूली बैगन, गेहूं का आटा प्रसाद के लिए, चावल का आटा गुड़,घी और तेल,
यह प्रमुख सामग्री है जो अनिवार्य है।
प्रसाद के लिए अलग से विभिन्न प्रकार के फल और मिठाई सुबह के पूजन के लिए गाय का ताजा दूध, फूल, सुगंधित धूप, अगरबत्ती, दीया अनिवार्य है।
षष्ठीतिथि को सुबह स्नान पूजन करने के बाद
प्रसाद बनाते हैं, ठैकूआ, गेहूं के आटे को गुड़ मिलाकर तेल में,
भूषवा, चावल के आटे में काला मरीच पावडर मिलाकर।भून लेते हैं। फिर गुड़ का चासनी तैयार कर लड्डू के जैसे बनाते हैं।
गुझिया, वो भी गेहूं के आटे में खोवा भरकर बनाया जाता है।
सभी प्रसाद को बांस के वर्तन में रखकर लाल या पीले वस्त्र से बांध कर,
घाट,(सरोवर) तक लेकर जाते हैं, जिसे भाड़ कहते हैं।ले जाने वाले भड़िया कहलाते हैं।
फिर डूबते सूर्य की पूजा करते हैं।
इसी प्रकार फिर से सप्तमी तिथि उगते सूर्य की पूजा करते हैं।
पूजन से पहले व्रती 3 घंटे तक पानी में रहती हैं सुबह, और शाम को दो घंटे तक पानी में रहकर ही सूर्य देव का आराधना करते हैं।
यह पूजन स्त्री और पुरुष दोनों करते हैं।
पूजन के बाद कथा सुनते हैं हाथ में केराव लेकर।
कथा के बाद उस के राव को वहां उपस्थित लोगों पर छिड़क देते हैं। फिर वही अंकुरित केराव को जमीन से चून कर व्रती अपना व्रत तोरते हैं।
कहते हैं जो इंसान जितना चून पाए उसका, क्योंकि यह जमीन से चून कर किसी और को नहीं दिया जाता है। मिला आप चून पाए तो आपके लिए भाग्य की बात है।
आगे की कथा अगले भाग में बतातीं हूं।।"
अम्बिका झा ✍️

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